Thursday, August 9, 2018

आखिर हार ही गए हरिवंश जी!

ये इसी देश में हो सकता है कि अलग देश की मांग के साथ राजनीति शुरू करने वाले व्यक्ति की मौत पर चौतरफ़ा मातम फैल जाए। वैसे भी मौत के बाद किसी को भी कोसना यहां पाप माना जाता है। फिर अगर मौत किसी रसूखदार या सत्ताभोगी इंसान की हुई हो, तो आपसे उसकी आलोचना का अधिकार भी इसी नैतिकता के नाम पर छीन लिया जाता है। इस तरह मौत के बाद इस देश में हर कोई देवता हो जाता है।
पर आज हम एक 'जीवित मृतक' की बात करेंगे। दरअसल, हम भारतीय एक ऐसी वैश्विक परंपरा का भी हिस्सा बन चुके हैं, जिसका मानना है कि 'उगते सूरज को सलाम करना चाहिए।' हालांकि, बिहार-झारखंड में बिना पंड़ित-पुरोहित और मंत्रोचारण के होने वाले छठ महापर्व में 'डूबते सूरज' को आज भी पूजा जाता है। यानी कि मैं जिस समाज में पैदा हुआ, उसमें सफल-असफल दोनों तरह की ताकतों को एक समान सम्मान देने का चलन रहा है। लेकिन, अब शायद हम बस इस चलन का निर्वाह करते हैं, हमारी वास्तविक मान्यताएं बदल चुकी हैं।
हरिवंश जी को राज्यसभा का उप-सभापति बनाया गया है। इसके बाद जिस तरह से उनके व्यक्तित्व की तारीफ़ में कसीदे काढ़े जा रहे हैं, वह हमारी बदलती मान्यताओं का प्रमाण हैं। आगे कुछ भी लिखने से पहले यह साफ करना ज़रूरी है कि हरिवंश जी मेरे भी प्रिय संपादक रहे हैं और रांची में पत्रकारिता करते हुए मैंने प्रभात ख़बर की सफलता को बेहद करीब से देखा है। इसलिए, मेरे लिखे को किसी तरह का लांछन मानने के बजाय सामयिक समीक्षा या आलोचना मानकर पढ़ा जाए।
जिस दौर में प्रभात ख़बर धनराज (धनबाद, रांची, जमशेदपुर) में तेजी से लोकप्रिय हो रहा था, वो समय झारखंड में घोर राजनीतिक अस्थिरता का था। बाबूलाल मरांडी की कुर्सी मूलवासी आंदोलन से उपजी हिंसा की भेंट चढ़ चुकी थी। सत्ता कभी मधु कोड़ा के हाथ का खिलौना बन जाती, तो कभी अर्जुन मुंडा के हाथ का। ज़ाहिर है, झारखंड की राजनीति पर केंद्रित मीडिया के पास लिखने-बताने के लिए काफ़ी कुछ था। हरिवंश जी ने भी सत्ता और राजनीति की इस उठा-पटक के बारे में खूब लिखा। इस तरह देखते ही देखते झारखंड में प्रभात खबर की लोकप्रियता शीर्ष पर पहुंच गई। हालांकि, प्रभात ख़बर को मिली कामयाबी के पीछे स्थानीय ख़बरों को बढ़ावा देने की नीति का भी बहुत योगदान रहा।
राज्यसभा में हरिवंश जी की तारीफ़ में प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी ने संक्षेप में वो सबकुछ कहा, जो हरिवंश जी की जीत पर उन्हें उम्मीदवार बनाने वाले गठबंधन के मुखिया को कहना चाहिए था। संसद, पीएम और कुछ हद तक मीडिया का यह स्टैंड समझ में आता है। लेकिन, पब्लिक डोमेन में कई बार ऐसा उत्सव का माहौल बना दिया जाता है कि ज़रूरी बातों पर चर्चा तक नहीं हो पाती।
आज जबकि हरिवंश जी की खामोशी पर भी चर्चा होनी चाहिए थी। उनकी और उनके अख़बार की उस चुप्पी पर भी बात होनी चाहिए थी, जो नीतीश कुमार के दूसरे शासनकाल (26 नवंबर, 2010 से लेकर 17 मई, 2014 तक) के दौरान सबको चुभी थी। यह क्यों न माना जाए कि इसी चुप्पी के लिए उन्हें राज्यसभा भेजकर उपकृत भी किया गया।
बीती बातों को छोड़कर आज के संदर्भ में भी अगर हरिवंश जी की जीत की समीक्षा की जाए, तो हरिवंश जी की तारीफ़ में कही गई सारी बातें बेइमानी लगने लगती हैं। आज जब पूरे बिहार की जनता 'मुज़फ़्फरपुर के महापाप' पर शर्मिंदा है। नीतीश कुमार के नेतृत्व की कमजोरी पर चौतरफ़ा उंगलियां उठ रही हैं। ऐसे मुश्किल वक्त में नैतिकता का तकाज़ा कहता था कि हरिवंश जी फिर से कलम सम्हालते। अपने मित्र की आलोचना करके सच्ची मित्रता निभाते। यह साबित कर देते कि उनके बारे में कही गई सारी बातें आज भी उतनी ही सच्ची हैं, जितनी कल थीं। लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। ये नैतिक बल वो दिखा नहीं पाए। यही हरिवंश जी की हार है।

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