Monday, August 20, 2018

ठोको गाली

वैसे Siddhu पाजी POK के राष्ट्रपति को जानते भी थे या नहीं? किसी न्यूज़ चैनल ने उनसे ये सवाल पूछा भी है या नहीं? सवाल तो शायद किसी न्यूज़ चैनल से भी नहीं पूछ गया होगा कि जब पूरा देश अपने एक पूर्व प्रधानमंत्री के निधन पर शोक मना रहा है और देश के एक सूबे में प्रलयंकारी बाढ़ आई हुई है, तब आप उस Siddhu की पाकिस्तान यात्रा की चर्चा में इतना समय क्यूं खपा रहे हैं, जो न तो सरकार के प्रतिनिधि बन कर वहां गए थे और ना ही अपनी मौजूदा पार्टी के नेता के तौर पर।
वैसे एक सवाल तो आपसे भी पूछा जाना चाहिए- क्या शोक में किसी को गालियां दी जा सकती हैं? (विषयांतर का खतरा है, इसलिए पीटने और पिटाई के औचित्य पर सवाल नहीं पूछूंगा।)
अभी ज़्यादा वक्त नहीं गुज़रा है, जब Siddhu बिल्कुल नए रूप में क्रिकेट मैच के फ़ायरब्रांड कमेंटेटर के रूप में टीवी पर अवतरित हुए थे। उनकी फ़ायरब्रांड वाली ये छवि तब और चमकदार हो जाती थी, जब वो इंडिया-पाकिस्तान के किसी मैच में माइक थाम के लगभग दोयम दर्ज़े की तुकबंदियां करते हुए राष्ट्रवाद की मार्केटिंग करते थे। आज जो लोग उनको बिना सांस लिए गालियां बक रहे हैं, वही कल तक उछल-उछल कर उनकी तुकबंदियों पर तालियां बजाया करते थे।
फिर जब Siddhu कॉमेडी नाइट विद कपिल के जज बनकर आए और उटपटांग जोक पर भी मुंह फाड़-फाड़ के ठहाके मारने लगे, तो धीरे-धीरे गंभीर लोगों ने उन्हें गंभीरता से लेना बंद कर दिया। तब तो हद ही हो गई, जब Siddhu कंटेस्टेंट बनकर Big Boss में भी पहुंच गए। इससे ये ज़ाहिर हो चुका था कि Siddhu अब किसी भी तरह खुद को चर्चा में रखना चाहते हैं।
उनकी फ़ायरब्रांड कमेंटेटर वाली छवि का फायदा उठाने के लिए भाजपा ने उन्हें अपने साथ जोड़ा। लेकिन तब तक तो Siddhu खुद को ही ब्रांड मानने लगे थे। इसलिए भाजपा से उनकी यारी ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाई।
भाजपा से उनकी बढ़ती दूरियों का लाभ उठाने की कोशिश आम आदमी पार्टी और कांग्रेस दोनों ने की, लेकिन सफलता कांग्रेस को मिली।
खुद को ब्रांड मान चुके Siddhu अब दरअसल किसी भी दल या समूह की सीमा को लांघ चुके हैं। कम से कम Siddhu तो ऐसा ही मानते हैं। इसलिए, जब कपिल देव और गवास्कर जैसे क्रिकेटर इमरान ख़ान का न्योता अस्वीकार कर देते हैं, तब भी Siddhu न्योता स्वीकार करने का खतरा मोल लेते हैं। अभी देश के मिजाज़ में यह समीकरण फिट कर दिया गया है कि सरकार की नीतियों का विरोध करने वाले शख्स को मुसलमान या पाकिस्तान के खांचे में ठेल दिया जाए। ऐसे समय में Siddhu का पाकिस्तान जाने का न्योता स्वीकार करना 'आ बैल मुझे मार' जैसा ही था। हालांकि, वहां Siddhu सरकार की किसी नीति का विरोध करने नहीं जा रहे थे। उनका गुनाह बस इतना है कि वे पाकिस्तान जा रहे थे।
बात सिर्फ़ इतनी सी है कि न्यूज़ चैनलों ने ये मौका लपक लिया है। वो दूरदर्शन की तर्ज़ पर सात दिन तक सारंगीवादन नहीं कर सकते। अटल जी की कविताएं उन्हें टीआरपी नहीं दिला सकतीं। इसलिए, जब इमरान के शपथ ग्रहण समारोह में Siddhu को पीछे से उठाकर पहली पंक्ति में बिठाया गया, तब भी हमारे देसी न्यूज़ चैनलों ने 'देश के अपमान' लायक मसाला ढूंढ ही लिया। जबकि सच तो ये है कि Siddhu चाहे जिसके भी बगल में बैठते, उनकी उपस्थिति का विश्लेषण 'एक खास तरीके' से ही होना तय था। पाकिस्तान के सेना प्रमुख बाजवा के साथ Siddhu ने गले मिलकर मीडिया को वो तस्वीर भी उपलब्ध करवा दी, जिस पर कई दिनों तक हो-हल्ला मचाने लायक मसाला तैयार किया जा सकता है।
जबकि बाजवा भारत के पूर्व सेनाध्यक्ष मेजर जनरल बिक्रम सिंह के अधीन दो साल (2012 से 2014 तक) कांगो में काम कर चुके हैं। यूएन पीस मिशन के तहत बाजवा की ओर से किए गए अच्छे काम की सराहना मेजर बिक्रम भी सार्वजनिक रूप से कर चुके हैं। लेकिन, उस वक्त मेजर बिक्रम की आलोचना शायद इसलिए नहीं हुई, क्योंकि तब सरकार दूसरी थी। मेजर बिक्रम शायद इसलिए भी मीडिया की आलोचना के दायरे से बाहर रहे, क्योंकि वे उस सेना का हिस्सा रहे हैं जिसकी सार्वजनिक आलोचना न करने की अघोषित परंपरा रही है।
इतने पर भी अगर आपको मीडिया की मौकापरस्त भूमिका पर यकीन नहीं होता तो इस ताज़ा उदाहरण पर नज़र दौड़ाएं-
अभी एक न्यूज़ चैनल की रिपोर्ट देखी, जिसमें Siddhu को पाकिस्तान में जूते की किसी दुकान से जूते खरीदते हुए दिखाया जा रहा था। चैनल का एंकर उनपर इस बात पर पिला पड़ा था कि जब देश वाजपेयी जी के निधन पर शोकाकुल है, तब ये आदमी शॉपिंग कैसे कर रहा है!

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