Monday, August 20, 2018

सच के पास वाला झूठ

साल 2015 में रिलीज़ हुई फ़िल्म 'डिटेक्टिव व्यमोकेश बक्शी' का एक डायलॉग मुझे आज रह-रह के याद आ रहा है। फिल्म का नायक एक सीन में कहता है- "सच के आस-पास वाला 'झूठ' पकड़ना मुश्किल होता है।"
'नाली के कचरे से गैस बनाने' का जो मामला आजकल सोशल मीडिया की फिज़ाओं में तैर रहा है, वह दुर्भाग्य से इसी डायलॉग की परिधि में आता है। आगे बढ़ने से पहले, ज़रा प्रधानमंत्री के संबोधन का वो अंश फिर से पढ़िए जिसके पक्ष और विपक्ष में मोर्चे बांध के ट्रोलिंग की जा रही है।
पीएम ने कहा, 'मैंने एक बार अखबार में पढ़ा था, किसी छोटे से नगर में एक नाले के पास कोई चाय का ठेला लेकर खड़ा रहता था और चाय बेचता था. जब चाय बनाने की बात आती है तो मेरा ध्यान थोड़ा जल्दी जाता है (इस पर कार्यक्रम में मौजूद सभी लोग तालियां बजाते हुए हंस पड़े).'
पीएम ने आगे कहा, 'वहीं पर गंदी नाली चलती थी. उसके दिमाग में एक विचार आया. स्वाभाविक है कि गंदी नाली में गैस भी निकलती है. दुर्गंध भी आती थी. उसने एक बर्तन को उल्टा करके, उसमें छेद करके एक पाइप डाल दिया और जो गटर से गैस निकलती थी उसे अपने चाय के ठेले पर ले लिया. इसके बाद वह इसी गैस से चाय बनाने लगा. सिंपल सी टेक्नोलॉजी है.'
जैसा कि आप जानते हैं पीएम के इस संबोधन का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो चुका है। कुछ लोगों ने (जिसमें मैं भी शामिल था) नाली के कचरे से गैस बनाए जाने की बात पर सवाल खड़े किए। इसके जवाब में कुछ लोग पहले 'द हिंदू' अख़बार की एक रिपोर्ट को यहां-वहां चस्पां करके पीएम की बात को सही साबित करने की कोशिश करते नज़र आए। जबकि 'द हिंदू' की रिपोर्ट में 'मानव मल' से बायो गैस बनाने की बात कही गई थी। ये 'गोबर गैस' जैसा ही प्रयोग है, जिसे लगभग असफल या अव्यवहारिक मानकर अस्सी के दशक में ही दरकिनार किया जा चुका है। हालांकि, ये सच है कि आज भी कुछ जगहों पर बायोगैस का इस्तेमाल ईंधन के तौर पर होता है। पर ये नाली के कचरे से गैस बनाने के दावे से बिल्कुल अलग चीज़ है।
इसके बाद 'छत्तीसगढ़ ख़बर' नाम की एक वेबसाइट में साल 2014 में छपी एक रिपोर्ट को साझा किया जाने लगा। रिपोर्ट पढ़ने पर साफ़ ज़ाहिर होता है कि लिखने वाले की विज्ञान की समझ कमज़ोर रही होगी। वरना रिपोर्ट में गंधहीन मीथेन की तुलना एलपीजी की विशेष गंध से नहीं की जाती। खैर, उस वक्त तक गूगल 'नाली', 'कचरा' 'गैस' जैसे कीवर्ड डालने पर इसी रिपोर्ट का लिंक दिखा रहा था। शायद इसी रिपोर्ट को पढ़ने के बाद 'सबसे तेज़' चैनल ने तेज़ी दिखाई और उस 'श्याम राव शिर्के' को खोज निकाला, जिनका नाम रिपोर्ट में लिया गया था।
'आज तक' चैनल की आधिकारिक वेबसाइट पर जो ताज़ा रिपोर्ट छापी गई है, उसकी ये लाइनें पढ़िए-
1. श्याम राव शिर्के के इस प्रोजेक्ट की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी तारीफ की है.
(जबकि, प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहीं भी श्याम राव शिर्के का नाम नहीं लिया है।)
2. रायपुर के चंगोराभाठा इलाके में रहने वाले 60 वर्षीय श्याम राव शिर्के का नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जुबान पर है.
(एक बार फिर झूठा दावा किया गया है।)
अब सबसे ज़रूरी और मज़ेदार बात। 'आजतक' की इसी ताज़ा रिपोर्ट में श्याम राव शिर्के जी का विस्तार से परिचय देते हुए ये पंक्ति लिखी गई हैै-
"वे 11वीं पास हैं. आय का कोई विशेष साधन नहीं है. उनकी आजीविका मैकेनिकल कॉन्ट्रैक्टरशिप पर निर्भर है."
ज़ाहिर है, रिपोर्ट लिखने वाला खुद बता रहा है कि श्याम राव जी का न कभी कोई 'चाय का ठेला' रहा है और न ही उन्होंने कभी 'चाय' बेची है। 'छत्तीसगढ़ ख़बर' में छपी पुरानी रिपोर्ट में भी कहा गया है कि श्याम राव जी के घर के पास बदबूदार नाले में खुदाई चल रही थी, जहां से उन्हें गैस बनाने का ख्याल आया।
चैनल ने श्याम राव जी के इंटरव्यू का एक वीडियो भी जारी किया है। जिसमें श्याम राव हाथ में एक रेखाचित्र लेकर बैठे हैं और अपने प्रोजेक्ट की कार्यप्रणाली के बारे में बता रहे हैं। यह 'बर्तन उल्टा करके छेद में पाइप डालने' जैसा आसान तो कतई नहीं लगता। (पोस्ट के साथ दी गई तस्वीर देखें।)
यानी प्रधानमंत्री अपने संबोधन में कम से कम श्याम राव जी की बात तो नहीं ही कर रहे थे। ज़ाहिर है चैनल ने एक झूठ परोसा है, जिसे सोशल मीडिया के आम यूजर्स के साथ-साथ दूसरे समाचार माध्यम भी फ़ॉलो कर रहे हैं।
इस बीच फ़ेसबुक के साथी और राजस्थान पत्रिका के वरिष्ठ पत्रकार Awesh Tiwari जी ने अपनी एक हालिया पोस्ट में लिखा है-
"मेरे एक मित्र है आईसीएसआर में वरिष्ठ वैज्ञानिक है मोदी भक्त भी है। कल अचानक फोन आया तो हमने पूछा कि यार यह गटर की गैस से चाय बनाने वाला आइडिया दिया कौन था? उन्होंने बताया कि किसी वैज्ञानिक ने नही दिया था आज तक के एक पत्रकार महोदय ने दिया था। उन्होंने इसके आगे और भी चौकाने वाली बात बताई । उन्होंने कहा कि चूंकि पीएम ने बोल दिया है इसलिए आइसीएसआर को शुक्रवार को एक पत्र भेजकर कहा गया है कि इसकी संभावना तलाशे कि गटर की गैस का व्यवसायिक इस्तेमाल कैसे हो? यह पायलट प्रोजेक्ट सबसे पहले बनारस में शुरू करने को कहा गया है इसके लिए वैज्ञानिकों की टीम अगले सप्ताह तक गठित हो जाएगी जो गैर पारंपरिक ऊर्जा मंत्रालय के अधीन काम करेगी। हम बोले यार ,गैस तो पारम्परिक है वो हंस दिए। फोन कटा तो मैं सोचा यह पत्रकार भी क्या क्या बुद्धि देते हैं।"
फिर भी मान लेते हैं कि प्रधानमंत्री जी ने जो किस्सा सुनाया है, वो वाकई सच्चा था। तो ऐसे में सवाल उठता है कि 'स्वच्छ भारत अभियान' के नाम पर देश की जनता से जो 'सेस' वसूला गया, क्या वह बेईमानी था? सरकार ने लोगों से कचरे के इस तरह के इस्तेमाल की अपील क्यों नहीं की? नाली के कचरे से बायोगैस बनाने की अवधारणा को वास्तविकता के धरातल पर लागू करने के लिए अब तक कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाया गया? सबसे बड़ी बात कि जब प्रधानमंत्री ऐसी कोई युक्ति जानते थे, तो उन्होंने अब तक इसे अपने भाषण के लिए संजो कर क्यों रखा?

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