Monday, February 8, 2016

सोलो डे (लंबी कहानी, पांचवीं कड़ी)

"भईया, आप मेरी जगह होते, तो क्या करते?"
मेरे यहां आने पर वो भरसक ख्याल रखता था कि सिगरेट के धुंए से मुझे परेशानी ना हो. इस वक्त वह खुली खिड़की के पास कुर्सी लगा कर सिगरेट के साथ चाय सुड़क रहा था. फेफड़े के धुएं को मुंह के रस्ते खिड़की के बाहर उछालने के बाद उसने यह सवाल मेरी तरफ उछाल दिया था.
"पता नहीं..." मुझे हाईपोथैटिकल सवालों से शुरू से कोफ्त होती है, इसलिए मैंने बिना माथा-पच्ची किए कहा.
"विपाश्यना बोले तो आईसोलेशन में जाने के बारे में आपका क्या ख्याल है?" सिगरेट का अंतिम कश लगाने के बाद अब वह बचे हुए टोटे को ठिकाने लगाने की जगह खोज रहा था और इस काम के दौरान भी उसके दिमाग ने मेरे लिए नया सवाल उपजा लिया था. मैं थोड़ी देर तक सोचता रहा.
"काटने पर भी मच्छर को ना मारूं, यह मुझसे नहीं होगा. घर-परिवार से कट के रहना...सोच कर ही जी घबराता है. ना मुझे टाइम से भूख लगती है और ना ही मैं हिसाब रख कर खाता हूं. साधू-सन्यासी बनने का साहस मुझमें तो नहीं." बचे हुए टोटे को उसने चाय के खाली हो चुके प्याले में ही ठिकाने लगा दिया था और फिलहाल मेरा जवाब सुनकर मुस्कुरा रहा था.

अगला दिन रविवार था. वह घंटों तक पुस्तक मेले से मेरी लाई क़िताबों के ढेर के साथ उलझा रहा, शायद कुछ पसंद की किताबें छांट रहा था. फिर उसने घर पर बात की. मेरी हार्ड ड्राइव उठाई और मेरे और टीवी पर चल रहे भारत-ऑस्ट्रेलिया के वन-डे मैच के बीच में आकर खड़ा हो गया.
"15 दिन ज़िंदा रहने के लिए कितने मैगी के पैकेट रखने पड़ेंगे." मेरे जी में आया कि रिमोट उसके सर पर दे मारूं, पर किसी तरह अपने गुस्से पर काबू किया.
"भाई मेरे, मैथ्स और रिजनिंग मेरे बस की होती, तो तुझ जैसों के साथ कलम से कहानियां नहीं बना रहा होता." मैंने खीज कर कहा.
"कोई गल नहीं, मत बताओ. चलो बाय!" इतना कह कर वह दनदनाते हुए दरवाज़े की तरफ चल पड़ा. मैं कुछ पूछ पाता इससे पहले ही दरवाज़े के पास पहुंच कर ठिठका और बिना मेरी तरफ देखे ही बोला-
"15 दिन के लिए आइसोलेशन में जा रहा हूं. मेरी खोज-ख़बर लेने की ज़रूरत नहीं है. मोबाइल तुम्हारे पास ही पड़ा है. तुम्हारी कुछ किताबें और हार्ड ड्राइव लेकर जा रहा हूं. ज़िंदगी और मौत का मामला हो, तभी तंग करना." इसके बाद वह चला गया.

 जब से उसकी नींद की गोली खाने की नई आदत का पता चला था, मैं उसे लेकर काफी सतर्कता बरतने लगा था. इसलिए, दो दिन तक जब वह सच में दिखाई नहीं दिया, तो मुझे उसकी चिंता होने लगी. उस दिन दफ्तर से लौटते वक्त बाइक का हैंडल बरबस ही उसके घर की तरफ जाने वाली सड़क की ओर मुड़ गया. जनाब घर की सीढ़ियों के पास ही मिल गए. कहने लगा कि आइसोलेशन में ही हूं, बस सिगरेट खत्म हो गई थी. मुझे बड़ी हंसी आई.

उस रात मैं उसके कमरे पर पहली बार रुका. उसके हाथों की बनी मैगी भी खाई, पर वह मुझसे ना के बराबर ही बोला. फिर वो अपनी चारपाई पर जाकर पसर गया. वह रह-रह कर करवटें बदलता था. यकीनन वो सोने का नाटक कर रहा था. मेरी आंखों में भी नींद नहीं थी. मैं काफी देर तक उसे यूं तड़पता देखता रहा. वह वाकई अकेला ही तो था. थोड़ी देर बाद मैं इस सोच में खो गया कि अगर मैं वाकई उसकी जगह होता, तो क्या करता?

(क्रमश:)

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