Saturday, February 6, 2016

स्टोरी डे (लंबी कहानी, चौथी कड़ी)


हमारी दोस्ती 'जय' और 'वीरू' टाइप नहीं थी. क्योंकि ना तो मैं उतना संजीदा था और ना ही वो उतना दिलफेंक. 'कृष्ण' और 'सुदामा' से भी इसकी तुलना जायज नहीं कही जा सकती. सबसे बड़ा फर्क तो यही था कि हम हाड़-मांस से बने साधारण इंसान थे. इसके अलावा हम दोनों मध्यवर्गीय परिवार से ही आते थे और कमाई के मामले में उन्नीस-बीस का ही अंतर था. शायद हमारी दोस्ती 'बिल गेट्स' और 'स्टीव जॉब्स' जैसी थी. मैं उसकी जीवन की त्रासदियों में अपनी कहानी ढूंढ लिया करता और वो दुनिया से अपनी बेबाक रचनाओं के बूते नया पंगा लेने की जुगत में लगा रहता. हम दोनों दुनिया से अपने-अपने ढंग से संवाद करते और जहां मौका मिलता एक-दूसरे को वैचारिक मतभेदों से भेद डालने में कोई कसर नहीं छोड़ते. पर आज जब प्यार में चोट खाकर वह असहाय होकर तड़प रहा था, तो हमारी नजदीकियां आपसी रिश्ते को नया नाम देने की उधेड़बुन में खोई हुई थीं.

उसने हॉस्पिटल में एडमिट होने से इंकार कर दिया था, सो उसे उठा कर अपने यहां ली ले आया था. दवाईयां अब तक ठीक से अपना असर नहीं दिखा पाई थीं. बुखार उतरने का नाम नहीं ले रहा था और कमजोरी की वजह से उसे बार-बार चक्कर भी आने लगे थे. इस बीच मैंने बॉस से कह कर 'वर्क टू होम' ले लिया था और दिन-रात उसी की देखभाल में लगा था.

उस रात मैं उसके माथे पर गीली पट्टियां रख कर बुखार उतारने की कोशिश में लगा था, जब उसने आंख मूंदे हुए ही अपनी कहानी बतानी शुरू की.

"हमारा प्यार शुरू से ही बेमेल था. वो सबकुछ मानने वाली लड़की थी, मैं हर चलन से विरोध जताने वाला लड़का था. उसे दुनिया को इसकी मौजूदा विसंगतियों के साथ स्वीकार करने की कला आती थी, वहीं मैं दुनिया बदलने के ख्वाब अब तक देखता हूं. हमारा अलग होना शायद पहले से तय था. क्योंकि हम दोनों में एक ही समानता थी कि हम अव्वल दर्जे के ज़िद्दी थे."

इतना कहने के बाद वह थोड़ी देर के लिए चुप्प हो गया. उसकी बंद आंखों के कोर से एक-एक करके कई बूंदें निकलने लगीं और पानी की एक लकीर सी बनाती हुई बिस्तर में कहीं गुम होने लगीं. भीगी पट्टी को उसके सिरहाने रख, मैं उसके सीने को अपने हाथों से हौले-हौले सहलाने लगा. कुछ पल बीते होंगे, जब उसके होठों पर एक दर्द भरी मुस्कान उभर आई और उसने हल्की सी आह भर कर दोबारा बोलना शुरू किया-

"प्यार करने वालों के साथ यही सबसे बड़ी दिक्कत है. पहले तो उन्हें अपने साथी का अलग स्वभाव अनूठा लगता है, पर बाद में यही अंतर अलगाव की वजह बनने लगता है. अक्सर जब दो प्यार करने वालों की जिद उनकी मोहब्बत से ज्यादा ताक़त पा जाती है, तो मज़बूत से मज़बूत रिश्ता भी टूट कर बिखर जाता है. हमारे साथ भी यही हुआ."

इसके बाद उसने आगे कुछ भी नहीं कहा. धीरे-धीरे उसकी सांसे आश्चर्यजनक रूप से सामान्य होने लगीं, बदन पसीना छोड़ने लगा और उसकी आंखें शिथिल पड़ती चली गईं. शायद उसने अब तक एक अनकही कहानी का बोझ अपने सीने पर लाद रखा था, जो बुखार की शक्ल में अब उतर चुका था.

(क्रमश:)

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