Thursday, February 4, 2016

स्लैप डे (लंबी कहानी, तीसरी कड़ी)

सुबह से दो बार उसकी मां का फोन आ चुका था. दफ्तर गया तो पता चला कि वो आज भी काम पर नहीं आया है. तरह-तरह के बुरे ख्याल मन में आने लगे. ग़लती मेरी ही थी, मुझे उसका मोबाइल फोन यूं अपने पास नहीं रखना चाहिए था. अब उसकी मां को क्या जवाब दूं? पर आखिर वो गया कहां? वैसे तो शाम से लेकर देर रात तक रोज कभी भी आकर मेरे घर का डोर बेल बजा ही देता था. कहीं ज़हर तो नहीं खा लिया? चूहा मारने की दवा तो उसके डेरे के बाजू वाले राजू किराना स्टोर में मिलती ही होगी? वहां नहीं तो मोर या रिलायंस फ्रेश से "हिट" तो खरीद ही सकता है. नहीं, वो इतना कमजोर नहीं. ज़रूर बाइक पंक्चर हो गई होगी. या ठंड की वजह से बाइक की बैट्री डाउन हो गई होगी और सेल्फ स्टार्ट काम नहीं कर रहा होगा. ढंग से किक मारना भी तो उसे नहीं आता. पर अब तक तो उसे फिर भी ऑफिस आ जाना चाहिए था. साढ़े बारह होने को हैं. ओला, उबर, ऑटो इतने तो ऑप्शन हैं. वैसे तो टाइम पर ही आता था, लेकिन जो हुआ उसके बाद उसे किसी भी तरह की पाबंदी की परवाह नहीं रह गई है. उसकी लेटलतीफी की बढ़ती आदत से बॉस से लेकर उसके कलिग तक नाराज़ होने लगे हैं. वो तो कहिए कि उसके काम का पिछला रिकॉर्ड इतना अच्छा है कि सब अब तक बर्दाश्त कर रहे हैं.
लंच की बेल बजी, तो मैं अपना टिफिन कैरियर लेकर कैंटीन की तरफ चल पड़ा. मन ठीक ना हो, तो अंडा करी भी आलू के बासी चोखे जैसी लगती है. जैसे-तैसे खाना निपटाया. पर दिमाग उसी के बारे में सोचता रहा. उसके रूम में तो पंखा भी नहीं है. लटक के को मर नहीं सकता. पट्ठे ने 'एसी' लगा रखा है, फिर भी मेरे घर पर आकर सोता है. खाना भी बाहर ही खाता है, इसलिए छूरी भी शायद उसके रूम पर ना ही हो. दाढ़ी भी इलैक्ट्रिक ट्रीमर से बनाता है, तो ब्लेड भी नहीं रखता होगा. मतलब, गले या कलाई की नस काट लेने के चांसेज़ भी ना के बराबर ही हैं. लेकिन, नस तो खिड़की का कांच तोड़ कर उससे भी काटी जा सकती है. मैं सिहर उठा. खुद पर बहुत गुस्सा आया, पर फिर भी उसके बारे में अंट-शंट ही सोचता रहा. मैंने ऑफिस के व्हाट्सअप ग्रुप पर एक मैसेज छोड़ा और चुपचाप उसके 'रूम' के लिए निकल पड़ा.

तीन मंजिला इमारत के टॉप फ्लोर पर छत के एक हिस्से पर बना छोटा सा कमरा था. दरवाज़े के पास पहुंच कर मैंने उसका नाम लेकर आवाज़ लगाई. पिछली बार आया था, तो उसकी गर्लफ्रेंड से यहीं पहली और आख़िरी बार मिला था. इसलिए, बेधड़क दरवाज़ा खटकाने की हिम्मत नहीं हुई. दरवाजे पर हाथ रखा तो वह भीतर की तरफ खुलता चला गया.

वह वहीं था. पटरे वाली छोटी सी चारपाई पर रजाई ओढ़े किसी लाश की तरह पड़ा हुआ था. वह शायद कराह रहा था या फिर उसके सीने का बलगम बज रहा था. मैंने हल्के से आवाज़ दी, पर उसके जिस्म में किसी भी तरह की हरकत नहीं हुई. मेरा जी एक बारगी जोर से घबराया. कहीं ये मरने वाला तो नहीं. पता चला कि मैं ही पुलिस-वुलिस के चक्कर में फंस जाऊं. मन हुआ की लौट चलूं. पर ये संस्कार साले ऐसे समय पे ही पांव पकड़ लेते हैं. धीरे से रजाई हटाई. उसकी सांसे चल रही थीं. सिर पर हाथ धरा, तो तेज तपिश महसूस हुई. शायद बेहोश था. नहीं, उसने नींद की गोलियां ली थीं. गोलियों की एक पूरी पत्ती उसके सिरहाने रखी थी. मैं पास रखे मयूर जग से पानी भर लाया. उसके चेहरे पर छिड़का, तो उसने धीरे-धीरे आंखें खोल दीं. मैंने गिलास को उसके होठों से सटा दिया. उसे होश आ गया था, पर मुझसे आंखें चुरा रहा था. मैं उसके बगल में चारपाई पर ही बैठ गया. मेरी भी समझ में नहीं आ रहा था कि उससे क्या कहूं. लेकिन चुप्पी मुझे काट खाए जा रही थी.

"बुखार में नींद की गोली खाता है कोई भला?" मैंने हल्की नाराज़गी से कहा. उसने गर्दन घुमा ली और बंद खिड़की को घूरने लगा.
"डॉक्टर के पास चलें?" पता नहीं क्यों इस सवाल पर उसने अपनी आंखें जोर से भींच लीं. मुझे बड़ी खीज हुई. मैंने इस बार तेज आवाज़ में पूछा-
"क्या चाहते हो?" उसने किसी रोबोट की तरह एक झटके में अपनी गर्दन घुमाई और मेरी तरफ देख कर चीख पड़ा-
"मर जाने दो मुझे, प्लीज़"
"तड़ाक"
मैंने उस दिन उस पर हाथ क्यों उठाया, मैं आज तक समझ नहीं पाया. बस इतना जानता हूं कि उसके गालों पर मैंने अपना गुस्सा नहीं निकाला था. वर्ना भला हम अगले ही पल गले लग कर क्यों रोए होते?

(कहानी अभी बाकी है)

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