Tuesday, February 2, 2016

सिनेमा डे (लंबी कहानी, दूसरी कड़ी)


"तमाशा" देखते-देखते वह हिचकियां ले-ले कर रोने लगा था. फिल्म बीच में ही छोड़नी पड़ी. अकेले बैठ के आंसू बहाना अलग बात है, पर यूं सरेआम!!! मैंने उससे साफ-साफ कह दिया-
"कुछ दिन के लिए थिएटर में मूवी देखना छोड़ दो."
किसी भी तरह की प्रतिक्रिया देने के बजाए, वह मूक बधिर बन गर्म पराठे पर धीरे-धीरे पिघलते मक्खन के टुकड़े को ही घूरता रहा.
"एक बार मोबाइल दो ना, क्या पता उसकी कॉल आई हो या फिर कोई मैसेज आया हो." पराठा खाते-खाते अचानक उसे अपने मोबाइल की याद हो आई थी. मैं कसमसा कर रह गया. 'आम' के विमर्श में 'इमली' को घसीट लाना उसका नया शगल बनता जा रहा था. पर गुस्सा होने के बजाए, ना जाने क्यों मुझे उस पर बहुत तरस आया.
"मोबाइल को तो तू भूल जा. ऐसा कुछ होगा तो मैं बता दूंगा."
मैंने उसका मोबाइल छीन लिया था. मजबूरी थी. बार-बार मोबाइल चेक करता रहता था. वजह पूछने पर कहता कि उसे कॉल आने का भ्रम होने लगा है. नींद में भी रिंगटोन सुनाई देने लगी है.
इसके बाद हम साथ में कोई मूवी देखने नहीं गए. पर इस वाक्ये का एक दूसरा असर भी हुआ. अब वह अक्सर मेरे यहां आने लगा. मुझसे बोलने बतियाने नहीं, मेरे डेस्कटॉप का मूवी फोल्डर एक्सप्लोर करने. मैंने भी सोचा कि चलो ठीक ही है, मन बहले ना बहले कम से कम सरेआम रोकर अपनी फजीहत तो नहीं करवाएगा.
"भईया, कल श्मशान चलोगे?" आधी रात को पानी पीने के लिए किचन की तरफ जा ही रहा था कि उसकी आवाज मेरे कानों से टकराई. पलट कर देखा, तो उसका चेहरा रजाई के अंदर ही था. मुझे लगा सपने में बड़बड़ा रहा है. पर पानी पीकर वापस लौट ही रहा था कि उसने दोबारा पूछ लिया.
"क्या बात हो गई." मैंने उसके करीब आकर आशंकित स्वर में सवाल किया.
"कुछ नहीं, बस आज 'मसान' देखी तो श्मशान जाने का जी किया." उसका चेहरा अब भी रजाई के अंदर ही था. मेरा सर बुरी तरह भन्ना गया. संस्कारों ने पांव पकड़ लिए, वर्ना एक लात तो उसे पड़ ही जाती.
अगले दिन हम हिंडन किनारे वाले श्मशान गए. कोई तीन लाशों को जलता हुआ देखा. वह खुश नज़र आ रहा था. वजह ना मैंने पूछी ना मुझे समझ आई.
अगली रात उसने वही किस्सा दोहरा दिया. बस इस बार उसकी चाहत जुदा थी.
"भईया, चमगादड़ भी तो ठंड में दांत किटकिटाते होंगे ना?"
पानी से भरा ग्लास पूरा गटकने के बाद मैंने बेपरवाही से कहा- "मुझे नहीं पता."
अगले ही पल वह रजाई फेंक कर यू खड़ा हो गया, जैसे शरीर में स्प्रिंग फिट हो.
"चलो ना देख के आते हैं." उसने मनुहार की.
उस रात हम सचमुच अपार्टमेंट के पास वाले नाले तक गए. कीकर और बबूल के झाड़ के पास मंडराने वाले चमगादड़ों की आवाज़ सुनने की नाकाम कोशिश की.
उसने खुशी से कूदते हुए घोषणा की "चमगादड़ ठंड में दांत नहीं किटकिटाते हैं." बाद में पता चला कि ये 'आंखों देखी' फिल्म का असर था.
फिर तो उसकी उट-पटांग हरकतों को जैसे पर लग गए. कभी 'शिप ऑफ थीसियस' देखने के बाद आंखें बंद करके कैमरे से तस्वीरें खींचने लगता, तो कभी 'मोटरसाइकिल डायरीज़' देखने के बाद अपनी बाइक के साथ कई दिनों तक गायब हो जाता.
एक दिन आते ही उसने कहा-
'थैंक्स भईया!'
अचानक उसके मुंह से थैंक्स सुनकर मेरा उत्सुक होना लाज़मी था. पर इस बार मैंने उसका खेल उसके साथ ही खेल दिया. गंभीरता ओढ़कर चुप्पी साधे रखी और हाथ में थमे अख़बार में आंखें यूं गड़ाए रखीं, जैसे दुनिया खत्म होने का समाचार पढ़ रहा होउं.
"थैंक्स भईया, बिना हैप्पी एंडिंग वाली फिल्मों से इंट्रोडक्शन करवाने के लिए." अपनी कृतज्ञता जता कर वह चला गया, शायद कोई दूसरी फिल्म देखने.
(कहानी अभी बाकी है.)


  

No comments:

Post a Comment