Monday, February 1, 2016

सिगरेट डे (लंबी कहानी, पहली कड़ी)

उसे पहचानना अब मुश्किल हो चला है. आंखें के खांचे खंडहर में बदल गए हैं और पुतलियां घुप्प अंधेरे में स्थिर खड़े प्रेत जैसी हो चली हैं. ये प्रेत भी शाम गहराते-गहराते सुलगने लगते हैं. जब से आंखों पर प्रेतों का साया पड़ा है, हंसी ने भी चेहरे की चौखट पर आना बंद कर दिया है. बहुत ज़रूरत पड़ने पर अब होठों से नहीं गले से हंसता है. इस खोखली हंसी से ही उसके फेफड़ों में बढ़ते बलगम के स्तर का अनुमान लगाया जा सकता है. मैंने एक दिन उसके काले पड़ते होठों को देख भावुकता से भर कर पूछा था- 
"इतनी सिगरेट क्यों पीने लगे हो?"
पर उसने जवाब नहीं दिया. अब वो सवालों के जवाब देता भी कहां है. बस थोड़ी देर के लिए उसका चेहरा विकृत हो उठता है और आप जान जाते हैं कि उसने आपका सवाल वाकई सुना है.
"कहीं पगला तो नहीं जाएगा? हरकतें तो वैसी ही हैं." उसकी लंबी चुप्पियों से डर कर अक्सर अब मैं ऐसा सोचने लगा हूं.
आजकल हर बात पर भावुक हो जाता है. सिसकने लगता है. सोचा था कि जुदाई-विरह के गानों से दूर रहेगा, तो जो हुआ उसे भूलने लायक हो सकेगा. पर वो तो न्यूज़ चैनल देख कर भी रो पड़ता है. जब रुलाई थाम लेता है, तो पलट कर अजीब से सवाल पूछने लगता है. ये दुनिया ऐसी क्यों है? ये प्यार सच में कोई भावना है भी या बस इसका शोर है? सबकुछ झूठ होता है क्या? ...और फिर मुझ से किसी तरह के जवाब के उम्मीद किए बिना खुद ही थोड़ी देर कुछ-कुछ बुदबुदाता है. जेब से टटोल कर माचिस निकालता है और एक नई सिगरेट सुलगा लेता है.
"मेरी आत्मा में सूजन हो गई है, उसी को सेंकता रहता हूं." गले वाली हंसी के साथ पिरो कर उसने ये बात काफी दिनों बाद कही थी. दो हफ्ते पहले पूछे गए सवाल का जवाब कोई अचानक दे, तो समझने में टाइम लगता है. पर मैं समझ गया, क्योंकि प्यार का तजुर्बा तो सबको होता है ना. :D

(क्रमश:)

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