Monday, January 18, 2016

रोहित वेमुला के नाम एक खुला खत

"मुझे विज्ञान से प्यार था, सितारों से, प्रकृति से, लेकिन मैंने लोगों से प्यार किया और ये नहीं जान पाया कि वो कब के प्रकृति को तलाक़ दे चुके हैं. हमारी भावनाएं दोयम दर्जे की हो गई हैं. हमारा प्रेम बनावटी है. हमारी मान्यताएं झूठी हैं. हमारी मौलिकता वैध है बस कृत्रिम कला के ज़रिए. यह बेहद कठिन हो गया है कि हम प्रेम करें और दुखी न हों."

प्रिय रोहित,
जिस दुनिया से तुमने असमय विदाई ली है, वहां मर चुके लोगों को पत्र लिखने का चलन नहीं है. फिर भी बड़ी शिद्दत से इसलिए यह पत्र लिख रहा हूं, क्योंकि, सुना है कि इस जहां में जिस चीज़ बड़ी शिद्दत से चाहो, उसे प्राप्त करने में पूरी क़ायनात मदद करती है. क्या पता, मेरा यह संदेश किसी तरह तुम तक पहुंच ही जाए. ना भी पहुंचे, तो ग़म नहीं. बस तसल्ली रहेगी कि मैंने कोशिश की.
बात ये है कि तुम्हारे सुसाइड नोट के जिस अंश का मैंने उपर उल्लेख किया है, उसने मुझे रात भर जगाए और रुलाए रखा. वाकई तुम अच्छा लिखते थे दोस्त. पर तुम्हारे लिखे शब्दों की अच्छाई के बजाए उसकी सच्चाई ने मुझे ज्यादा परेशान किया. लगा, जैसे मेरी खुद की भावनाएं ही तुम्हारे सुसाइड नोट पर उतर गई हों. दुखद यह है कि हमारी स्थितियां तो एक जैसी हैं, पर हमने जीवन को लेकर फैसले अलग-अलग लिए हैं. तुम्हें विज्ञान से प्यार था, सितारों और प्रकृति से भी. मुझे स्वतंत्र विचारों से प्रेम है और इससे जुड़ी दूसरी चीज़ों से भी. इस जहान का हर प्राणी किसी ना किसी चीज़ से प्यार तो करता ही है. लोगों का ढकोसला-दिखावा मुझे भी कचोटता है. और सिर्फ अपनी बात क्यों करूं. कौन है यहां, जो इन चीज़ों का शिकार नहीं होता? आदमी कभी नेता बन के, कभी अभिनेता बन के, तो कभी सगा रिश्तेदार बन कर भी ठगी करता रहा है, करता रहेगा.
तुम भावनाओं के दोयम दर्जे का होने पर निराश थे, पर दोस्त इसका स्तर कब और किस काल में ऊंचा था? प्यार में छल-धोका कब नहीं था? मान्यताएं कब संकीर्ण नहीं थीं? कृत्रिम संस्कारों से बंधा मानव कब अपने सोच-विचार से मौलिक था? दोस्त, तुमने कभी कोई ऐसी प्रेम कहानी सुनी, जिसमें दुख का नामोनिशान नहीं था?
तुम्हारी लिखी तमाम वजहें दुख का सबब तो हैं, पर इसके लिए खुद को खत्म कर लिया जाए यह निर्णय कम से कम मेरी समझ से परे है. सिर्फ तुम ही नहीं, हम में से हरेक तुम्हारे आख़िरी ख़त में लिखी विडम्बनाओं और अंतर्विरोधों का शिकार है. यहां हमारी हर सांस पर मौत हावी होने की कोशिश करती है. पर क्या करें, मौत को कैसे जीतने दें? निसंदेह, तुम हम सब से ज्यादा सजग और संवेदनशील रहे होगे. इसलिए शायद आहत भी ज़्यादा हुए. हमने थोड़ा-बहुत ही सही समझौता करना सीख लिया है. पीएचडी तक की पढ़ाई तुम्हें शायद वह नहीं सिखा पाई.
बाबा साहेब को निश्चित तौर पर तुम मुझसे बेहतर जानते होगे. कैसे उनका कठिन जीवन भी तुम्हें प्रेरणा नहीं दे पाया? मुझे समझाओ कि आत्महत्या करने वाले किसानों या मौत को गले लगाने वाले असफल प्रेमी-प्रेमिकाओं से मैं तुम्हें कैसे अलग मानूं. हममें से हर कोई किसी ना किसी रूप में दलित है. जिसके पास सत्ता नहीं है, पावर नहीं है, वह यहां दलित है. इसी समाज से लड़कर तुम हैदराबाद तक पढ़ने जा सके, फिर इस लड़ाई को बीच में छोड़ देने की क्या वजह रही होगी, मैं समझ नहीं पा रहा.
हममें से कईयों का बचपन अच्छा रहा है. पर मलाला यूफ़जई भी तो इसी ज़माने में पैदा होती है. गांधी भी तो यहीं ट्रेन से धकेले जाने के बाद भी आत्महत्या नहीं करते. हम में से कई तो अपने दुखद जीवन की राह में अकेले ही घिसट रहे हैं, हममें से कई को तो अपने जीने की वजह तक पता नहीं. पर तुम्हारे पास तो एक संगठन था, लोग थे, संघर्ष की एक वाजिब वजह थी और सबसे बड़ी बात की एक सपना था...लेखक बनने का सपना! ढिबरी की राख से छपाई करने वाले प्रेमचंद के देश में एक प्रतिभावान लेखक का यूं मौत को गले लगा लेना, मुझे बेचैन करता है.
मुझे यकीन है कि तुम जहां कहीं भी होगे अपने फैसले पर खुश नहीं होगे. थोड़ा ही सही, तुमहें पछतावा ज़रूर होगा. दोस्त, इस ज़माने को तुम्हारे जैसे संजीदा लोगों की सबसे ज्यादा ज़रूरत है और आगे भी रहेगी. हो सके तो वापस इसी ज़माने में इंसान बन कर ही लौटने की कोशिश करना और इस बार अपने अधूरे सपने को ज़रूर पूरा करना.

- तुम्हारे सुसाइड नोट का एक पाठक

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