Monday, January 18, 2016

मौसम और मजदूर


एक पतली टी-शर्ट उसके उपर एक पूरे बाजू का स्वेट शर्ट उसके उपर एक पैराशूट के कपड़े का बना हुड वाला जैकेट और उसके उपर जयपुरी कंबल!!! बंगलुरू से ध्रूवीय इलाके के एस्किमो जितने सुरक्षा इंतज़ामों से लैस होकर दिल्ली के लिए कूच किया था, तो पसीने से तर-बतर होने के बावजूद मन में तसल्ली थी कि दिल्ली पहुंच कर इस बार ठंड को ठेंगा दिखा देंगे. पर ऐसा हुआ नहीं. बंगलूरू-कटरा प्रीमियम ट्रेन जैसे-जैसे दिल्ली के करीब पहुंचने लगी, शरीर पर रोएं दूब घास की तरह अकड़ कर खड़े होने लगे. पकौड़े जैसी नाक गुलाब का पकौड़ा बन गई. किसी साइको आशिक की तरह कोहरा तो झांसी से ही ट्रेन के पीछे पड़ गया था. बेचारी ट्रेन का बुरा हाल था. फरीदाबाद में अचानक रॉवड़ी राठौरी चायवाले का डायलॉग कानों में पड़ा. ठंड के ख्याल को भटकाने के लिए झट से एक कप खरीद कर सुड़कने लगा. इधर, सूर्य देवता भी ट्रेन को रेसक्यू करने पहुंच गए थे. मोबाइल चेक किया तो पाया कि सर्विस प्रोवाइडर हरियाणा में स्वागत कर चुका है और स्वागत संदेश में ही रोमिंग का रेट टांक कर भेज चुका है. तमाम नोटिफिकेशन से निवृत्त होने के बाद होम स्क्रीन पर नज़र आ रहे एक्यूवेदर के एप्प पर ध्यान गया- बंगलुरू- न्यूनतम 19 डिग्री सेल्सियस!
...और दिल्ली का?...मन ने खुद से ही सवाल किया.
झट से एप्प की लोकेशन सेटिंग को बदला और तुरंत ही जवाब सामने था-
दिल्ली- न्यूनतम-7 डिग्री सेल्सियस और अधिकतम 19 डिग्री सेल्सियस !!!
दिमाग ने बिना कहे हिसाब लगा कर बता दिया- भीड़ू जो बंगलुरू का न्यूनतम है, वह दिल्ली का अधिकतम है.
रावड़ी राठौरी चाय की गर्मी तुरंत हवा हो गई. तुरंत मन को भटकाने के उपाय सोचने लगा.
क्यों रहता हूं मैं दिल्ली में? 
ये क्या फालतू का सवाल है, कमाने के लिए, पेट पालने के लिए...और क्यों...सारे बिहारी या दूसरे प्रदेशों के लोग इसलिए तो दिल्ली में रहते हैं. पहले अपने यहां के मजदूर जाया करते थे- कलकत्ता कमाने. फिर दिल्ली भी जाने लगे और फिर लुधियाना और सूरत भी. खेतिहर मजदूर आज भी तो जाते हैं- पंजाब और हरियाणा के खेतों में काम करने. बैल तो तुम भी हो, बस जरा पढ़-लिख गए, इसलिए दूसरी तरह से जोते जाते हो.
कोई कमाने के लिए गोवा, दमन, दीव, खंडाला क्यों नहीं जाता?
ऐसा भी नहीं कि कोई नहीं जाता. कुछ लोग तो जाते ही हैं. याद नहीं, वो समंदर पर स्पीड बोट किराए पर देने वाला बलिया का छोकरा और वो पेट्रोल पंप पर स्कूटी की टंकी में तेल डालते हुए अचानक टोक कर पूछने वाला युवक कि कहां के रहे वाला हैं भईया?
अरे हां! पर सब गरीब ऐसी जगहों पर काम के लिए क्यों नहीं जाते? वहां तो कमाई भी अच्छी है और फिर ठंड जैसा "एंटी गरीब" मौसम भी नहीं.
भाषा और खानपान सबसे बड़ी बाधा है. क्या पता धर्म भी हो. जैसे हिंदू अरब देशों में कमाई के लिए जाने से कतराते हैं या उनके लिए वहां अवसर कम होते हैं, वैसा ही शायद ऐसी जगहों के साथ भी हो. अंग्रेज़ी जानना, तो पहली शर्त है ही. यही एक भाषा है, जो हर बंधन से आज़ाद करने की कुव्वत रखती है. कम से कम हिंदुस्तान में तो ज़रूर. अब अगर कोई अंग्रेज़ी को ग़रीबों की भाषा बनाने का अभियान चलाए, तो देश की बहुतेरी समस्याएं हल हो सकती हैं. बेरोज़गारी तो बहुत हद तक दूर की जा सकती है. धार्मिक कट्टरता भी अपने आप चली जाएगी. सोचो कि गोवा में किसी पुर्तगाली के यहां बीफ सैंडविच या पॉर्क हैम बर्गरीय वातावरण में काम करने वाले कर्मचारी के मन में भला किसी तरह की धार्मिक कट्टरता पनप सकती है?
पर इसका मतलब क्या कि सब अंग्रेज़ हो जाएं या फिर इसाई?
त्रिनिदाद और टोबैगो या फिर कनाडा और लंदन जाने वाले सारे लोग कंवर्ट हो गए क्या? अभी सुना तो होगा ही कि एक भारतीय हिंदू दंपत्ति ने मलयेशिया की पहली इस्लामिक एयरलाइन शुरू की है, जिसमें शरियत के अनुरूप सेवाओं की पेशकश की जाएगी. इसमें उड़ान से पहले नमाज अदा करना, उड़ान के दौरान शराब या पोर्क से बने व्यंजन का परोसा नहीं जाना और एयर होस्टेस के लिए पोशाक के सख्त नियम शामिल हैं.
"हां, सुना तो है...पर इसका क्या मतलब हुआ..."
 मतलब ये हुआ कि अंग्रेज़ों ने हम पर हुकूमत की फूट डालो और शासन करो की नीति के तहत. अब यही काम राजनेता करते हैं. अगर हिंदुस्तान को वाकई तरक्की करना है, तो उसे हर तरह के ढकोसलों और ढोंग से मुक्ति पानी होगी. हिंदी परस्त होने का मतलब नहीं कि अंग्रेज़ी को गरियाएंगे. देशभक्त होने का मतलब ये नहीं कि सिर्फ दूसरे देशों से नफरत करेंगे. संस्कारी होने का मतलब ये नहीं कि दूसरों के अच्छे संस्कारों नहीं अपनाएंगे. 
"ई सब बात का अभी जो ठंड लग रही है, उससे का लेना-देना है?"
नहीं लेना-देना है, तो देखो जरा खिड़की के शीशे से बाहर. बारहपुल्ला का फ्लाईओवर उपर से निकल रहा है. सामान समेटो, निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन आने ही वाला है.

- समीर रंजन


No comments:

Post a Comment