Wednesday, January 27, 2016

मिस्टर जुगाड़ू को बनाएं "मेक इन इंडिया" कैम्पेन का ब्रांड एम्बेसडर



उस दिन एकता कपूर मार्का सास-बहू सीरियल में नाहक सदमा खाकर चिल्लाने और सदाबहार जवानी धारण करने वाले किरदार की तरह ही मेरी भी चीख निकल गई, जब मैंने सुलेखा डॉट.कॉम का "मेरा नाम है जुगाड़ू" वाला विज्ञापन पहली बार देखा. मेरी भावनाएं वैसे ही आहत हो गईं, जैसे कीकू का एक्ट देख कर बाबा राम-रहीम के फॉलोवर की हुई होगी. असहिष्णुता की चिंताएं बिल्कुल आमिर और शाहरुख की तरह ही मेरी पेशानी पर चस्पां हो गईं. 

रहते होंगे लोग सत्य और ईश्वर की तलाश में, पर मैं तो बचपन से लेकर अबतक नए-नए जुगाड़ की तलाश में ही रहा हूं. बिना पढ़े पास होने का जुगाड़, परीक्षा दिए बिना नौकरी पाने के लिए जान-पहचान का जुगाड़, बिना नहाए सर्दी गुजार देने का जुगाड़, बिना दूध के चाय बना लेने का जुगाड़, बिना तार बांधे कपड़े सुखा लेने का जुगाड़ और तो और बिना प्यार-मोहब्बत के जिंदगी जीने का जुगाड़ तक खोजता-तलाशता रहा हूं. जुगाड़ मुझे विज्ञान से जोड़ता है. जुगाड़ पर यू-ट्यूबीय रिसर्च से ही जाना कि हेटमेट पहन कर भी प्याज काटा जा सकता है और अगर ट्वायलेट का कमोड रूमाल-मोजे-गंजी के कॉम्बिनेशन से जाम हो जाए, तो उसे झाड़ू, बोतल और पॉलीथीन की मदद से हटाया जा सकता है. जुगाड़ मुझे न्यूटन और आइंसटाइन से जोड़ता है. मेरा निजी मानना है कि रोहित वेमूला को ही अगर जो जुगाड़ से जीने की कला पता होती, तो आत्महत्या करने की नौबत आती ही नहीं. 

अब बताइए मिस्टर जुगाड़ू ने कौन सा ऐसा काम किया कि उसे अपनी पत्नी के ताने सुनने पड़ गए? कूलर की हवा का विकेंद्रीकरण करना आईपीसी की किस धारा या भारतीय परंपरा की किस लकोकती और मुहावरे के तहत अपराध या बेवकूफी की श्रेणी में आता है? या क्या यह घोर अन्याय नहीं है कि जो बंदा बाइक पर सोफा सजाकर औरतों को लिफ्ट दे, उसकी अपनी लुगाई ही उसे लिफ्ट ना दे ! 

हां, जुगाड़ कई बार फेल हो जाते हैं. पर कौन से आविष्कार एक बार में पूरे हो जाते हैं. इंसान का अब तक का सबसे बड़ा आविष्कार "पहिया" क्या जुगाड़ नहीं था? ज़रूर मिसेज़ जुगाड़ ने चिराग, जिन्न और अलाद्दीन की अरबी कहानी पर ज़रूरत से ज़्यादा यकीन किया होगा या फिर खुद को सिंड्रेला सरीखा मान लिया होगा. हो सकता है उनकी स्कूल यूनिफॉर्म का बटन अचानक कभी टूटा ही ना हो और उनकी मां-टीचर या सखी ने उसकी जगह सेफ्टी पिन कभी लगाया ही नहीं हो. खैर, मेरा कहना यह है कि जुगाड़ हमारे महान देश की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग रहा है. दुनिया भले ही विश्वास की धूरी पर टिकी हो, पर इंडिया जुगाड़ से चलता है. इसलिए जुगाड़ की मान्यता के साथ किसी भी तरह की छेड़खानी को हमें अपनी अस्मिता पर हमला मानना चाहिए. 

"कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी।
सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-ज़माँ हमारा।।"
इस कालजयी रचना में इक़बाल साहब ने जिस "कुछ" को डिफाइन नहीं किया था, वह "कुछ" दरअसल कुछ और नहीं बल्कि जुगाड़ है. जुगाड़ हमारे ख़ून में है. कोई आश्चर्य नहीं कि नेता जी से संबंधित जो गोपनीय दस्तावेज़ जारी किए गए हैं, उनमें भी उनका इक़रारनामा दर्ज हो कि अगर उन्होंने लोगों से ख़ून की जगह जुगाड़ मांगा होता, तो आज़ादी बहुत पहले मिल गई होती. अब बापू का "चरखा" ही क्या था? बताइए, इतना बड़ा जुगाड़ स्वतंत्रता आंदोलन के केंद्र में रहा और आज आज़ाद भारत में जुगाड़ू सोच का इस तरह सरेटीवी माखौल उड़ाया जा रहा है.

तो जो कोई भी समाज और संस्कृति के ठेकेदार हैं जरा देह पर का गर्दा झाड़ के खड़ा हो जाएं. सरकार भी जरा संज्ञान ले. खाली "मेक इन इंडिया" का विज्ञापन करने से नहीं होगा, इस टाइप का प्रचार को भी रोकना होगा. हो सके तो आप लोग भी प्रेशर बनाइए, इंक्रेडिबल इंडिया कैम्पेन से आमिर ख़ान का पत्ता काट सकते हैं, तो फिर मिस्टर जुगाड़ू को "मेक इन इंडिया" कैम्पेन में सेट करना भी आपके अख्तियार में है.
जय जुगाड़!

Monday, January 18, 2016

रोहित वेमुला के नाम एक खुला खत

"मुझे विज्ञान से प्यार था, सितारों से, प्रकृति से, लेकिन मैंने लोगों से प्यार किया और ये नहीं जान पाया कि वो कब के प्रकृति को तलाक़ दे चुके हैं. हमारी भावनाएं दोयम दर्जे की हो गई हैं. हमारा प्रेम बनावटी है. हमारी मान्यताएं झूठी हैं. हमारी मौलिकता वैध है बस कृत्रिम कला के ज़रिए. यह बेहद कठिन हो गया है कि हम प्रेम करें और दुखी न हों."

प्रिय रोहित,
जिस दुनिया से तुमने असमय विदाई ली है, वहां मर चुके लोगों को पत्र लिखने का चलन नहीं है. फिर भी बड़ी शिद्दत से इसलिए यह पत्र लिख रहा हूं, क्योंकि, सुना है कि इस जहां में जिस चीज़ बड़ी शिद्दत से चाहो, उसे प्राप्त करने में पूरी क़ायनात मदद करती है. क्या पता, मेरा यह संदेश किसी तरह तुम तक पहुंच ही जाए. ना भी पहुंचे, तो ग़म नहीं. बस तसल्ली रहेगी कि मैंने कोशिश की.
बात ये है कि तुम्हारे सुसाइड नोट के जिस अंश का मैंने उपर उल्लेख किया है, उसने मुझे रात भर जगाए और रुलाए रखा. वाकई तुम अच्छा लिखते थे दोस्त. पर तुम्हारे लिखे शब्दों की अच्छाई के बजाए उसकी सच्चाई ने मुझे ज्यादा परेशान किया. लगा, जैसे मेरी खुद की भावनाएं ही तुम्हारे सुसाइड नोट पर उतर गई हों. दुखद यह है कि हमारी स्थितियां तो एक जैसी हैं, पर हमने जीवन को लेकर फैसले अलग-अलग लिए हैं. तुम्हें विज्ञान से प्यार था, सितारों और प्रकृति से भी. मुझे स्वतंत्र विचारों से प्रेम है और इससे जुड़ी दूसरी चीज़ों से भी. इस जहान का हर प्राणी किसी ना किसी चीज़ से प्यार तो करता ही है. लोगों का ढकोसला-दिखावा मुझे भी कचोटता है. और सिर्फ अपनी बात क्यों करूं. कौन है यहां, जो इन चीज़ों का शिकार नहीं होता? आदमी कभी नेता बन के, कभी अभिनेता बन के, तो कभी सगा रिश्तेदार बन कर भी ठगी करता रहा है, करता रहेगा.
तुम भावनाओं के दोयम दर्जे का होने पर निराश थे, पर दोस्त इसका स्तर कब और किस काल में ऊंचा था? प्यार में छल-धोका कब नहीं था? मान्यताएं कब संकीर्ण नहीं थीं? कृत्रिम संस्कारों से बंधा मानव कब अपने सोच-विचार से मौलिक था? दोस्त, तुमने कभी कोई ऐसी प्रेम कहानी सुनी, जिसमें दुख का नामोनिशान नहीं था?
तुम्हारी लिखी तमाम वजहें दुख का सबब तो हैं, पर इसके लिए खुद को खत्म कर लिया जाए यह निर्णय कम से कम मेरी समझ से परे है. सिर्फ तुम ही नहीं, हम में से हरेक तुम्हारे आख़िरी ख़त में लिखी विडम्बनाओं और अंतर्विरोधों का शिकार है. यहां हमारी हर सांस पर मौत हावी होने की कोशिश करती है. पर क्या करें, मौत को कैसे जीतने दें? निसंदेह, तुम हम सब से ज्यादा सजग और संवेदनशील रहे होगे. इसलिए शायद आहत भी ज़्यादा हुए. हमने थोड़ा-बहुत ही सही समझौता करना सीख लिया है. पीएचडी तक की पढ़ाई तुम्हें शायद वह नहीं सिखा पाई.
बाबा साहेब को निश्चित तौर पर तुम मुझसे बेहतर जानते होगे. कैसे उनका कठिन जीवन भी तुम्हें प्रेरणा नहीं दे पाया? मुझे समझाओ कि आत्महत्या करने वाले किसानों या मौत को गले लगाने वाले असफल प्रेमी-प्रेमिकाओं से मैं तुम्हें कैसे अलग मानूं. हममें से हर कोई किसी ना किसी रूप में दलित है. जिसके पास सत्ता नहीं है, पावर नहीं है, वह यहां दलित है. इसी समाज से लड़कर तुम हैदराबाद तक पढ़ने जा सके, फिर इस लड़ाई को बीच में छोड़ देने की क्या वजह रही होगी, मैं समझ नहीं पा रहा.
हममें से कईयों का बचपन अच्छा रहा है. पर मलाला यूफ़जई भी तो इसी ज़माने में पैदा होती है. गांधी भी तो यहीं ट्रेन से धकेले जाने के बाद भी आत्महत्या नहीं करते. हम में से कई तो अपने दुखद जीवन की राह में अकेले ही घिसट रहे हैं, हममें से कई को तो अपने जीने की वजह तक पता नहीं. पर तुम्हारे पास तो एक संगठन था, लोग थे, संघर्ष की एक वाजिब वजह थी और सबसे बड़ी बात की एक सपना था...लेखक बनने का सपना! ढिबरी की राख से छपाई करने वाले प्रेमचंद के देश में एक प्रतिभावान लेखक का यूं मौत को गले लगा लेना, मुझे बेचैन करता है.
मुझे यकीन है कि तुम जहां कहीं भी होगे अपने फैसले पर खुश नहीं होगे. थोड़ा ही सही, तुमहें पछतावा ज़रूर होगा. दोस्त, इस ज़माने को तुम्हारे जैसे संजीदा लोगों की सबसे ज्यादा ज़रूरत है और आगे भी रहेगी. हो सके तो वापस इसी ज़माने में इंसान बन कर ही लौटने की कोशिश करना और इस बार अपने अधूरे सपने को ज़रूर पूरा करना.

- तुम्हारे सुसाइड नोट का एक पाठक

मौसम और मजदूर


एक पतली टी-शर्ट उसके उपर एक पूरे बाजू का स्वेट शर्ट उसके उपर एक पैराशूट के कपड़े का बना हुड वाला जैकेट और उसके उपर जयपुरी कंबल!!! बंगलुरू से ध्रूवीय इलाके के एस्किमो जितने सुरक्षा इंतज़ामों से लैस होकर दिल्ली के लिए कूच किया था, तो पसीने से तर-बतर होने के बावजूद मन में तसल्ली थी कि दिल्ली पहुंच कर इस बार ठंड को ठेंगा दिखा देंगे. पर ऐसा हुआ नहीं. बंगलूरू-कटरा प्रीमियम ट्रेन जैसे-जैसे दिल्ली के करीब पहुंचने लगी, शरीर पर रोएं दूब घास की तरह अकड़ कर खड़े होने लगे. पकौड़े जैसी नाक गुलाब का पकौड़ा बन गई. किसी साइको आशिक की तरह कोहरा तो झांसी से ही ट्रेन के पीछे पड़ गया था. बेचारी ट्रेन का बुरा हाल था. फरीदाबाद में अचानक रॉवड़ी राठौरी चायवाले का डायलॉग कानों में पड़ा. ठंड के ख्याल को भटकाने के लिए झट से एक कप खरीद कर सुड़कने लगा. इधर, सूर्य देवता भी ट्रेन को रेसक्यू करने पहुंच गए थे. मोबाइल चेक किया तो पाया कि सर्विस प्रोवाइडर हरियाणा में स्वागत कर चुका है और स्वागत संदेश में ही रोमिंग का रेट टांक कर भेज चुका है. तमाम नोटिफिकेशन से निवृत्त होने के बाद होम स्क्रीन पर नज़र आ रहे एक्यूवेदर के एप्प पर ध्यान गया- बंगलुरू- न्यूनतम 19 डिग्री सेल्सियस!
...और दिल्ली का?...मन ने खुद से ही सवाल किया.
झट से एप्प की लोकेशन सेटिंग को बदला और तुरंत ही जवाब सामने था-
दिल्ली- न्यूनतम-7 डिग्री सेल्सियस और अधिकतम 19 डिग्री सेल्सियस !!!
दिमाग ने बिना कहे हिसाब लगा कर बता दिया- भीड़ू जो बंगलुरू का न्यूनतम है, वह दिल्ली का अधिकतम है.
रावड़ी राठौरी चाय की गर्मी तुरंत हवा हो गई. तुरंत मन को भटकाने के उपाय सोचने लगा.
क्यों रहता हूं मैं दिल्ली में? 
ये क्या फालतू का सवाल है, कमाने के लिए, पेट पालने के लिए...और क्यों...सारे बिहारी या दूसरे प्रदेशों के लोग इसलिए तो दिल्ली में रहते हैं. पहले अपने यहां के मजदूर जाया करते थे- कलकत्ता कमाने. फिर दिल्ली भी जाने लगे और फिर लुधियाना और सूरत भी. खेतिहर मजदूर आज भी तो जाते हैं- पंजाब और हरियाणा के खेतों में काम करने. बैल तो तुम भी हो, बस जरा पढ़-लिख गए, इसलिए दूसरी तरह से जोते जाते हो.
कोई कमाने के लिए गोवा, दमन, दीव, खंडाला क्यों नहीं जाता?
ऐसा भी नहीं कि कोई नहीं जाता. कुछ लोग तो जाते ही हैं. याद नहीं, वो समंदर पर स्पीड बोट किराए पर देने वाला बलिया का छोकरा और वो पेट्रोल पंप पर स्कूटी की टंकी में तेल डालते हुए अचानक टोक कर पूछने वाला युवक कि कहां के रहे वाला हैं भईया?
अरे हां! पर सब गरीब ऐसी जगहों पर काम के लिए क्यों नहीं जाते? वहां तो कमाई भी अच्छी है और फिर ठंड जैसा "एंटी गरीब" मौसम भी नहीं.
भाषा और खानपान सबसे बड़ी बाधा है. क्या पता धर्म भी हो. जैसे हिंदू अरब देशों में कमाई के लिए जाने से कतराते हैं या उनके लिए वहां अवसर कम होते हैं, वैसा ही शायद ऐसी जगहों के साथ भी हो. अंग्रेज़ी जानना, तो पहली शर्त है ही. यही एक भाषा है, जो हर बंधन से आज़ाद करने की कुव्वत रखती है. कम से कम हिंदुस्तान में तो ज़रूर. अब अगर कोई अंग्रेज़ी को ग़रीबों की भाषा बनाने का अभियान चलाए, तो देश की बहुतेरी समस्याएं हल हो सकती हैं. बेरोज़गारी तो बहुत हद तक दूर की जा सकती है. धार्मिक कट्टरता भी अपने आप चली जाएगी. सोचो कि गोवा में किसी पुर्तगाली के यहां बीफ सैंडविच या पॉर्क हैम बर्गरीय वातावरण में काम करने वाले कर्मचारी के मन में भला किसी तरह की धार्मिक कट्टरता पनप सकती है?
पर इसका मतलब क्या कि सब अंग्रेज़ हो जाएं या फिर इसाई?
त्रिनिदाद और टोबैगो या फिर कनाडा और लंदन जाने वाले सारे लोग कंवर्ट हो गए क्या? अभी सुना तो होगा ही कि एक भारतीय हिंदू दंपत्ति ने मलयेशिया की पहली इस्लामिक एयरलाइन शुरू की है, जिसमें शरियत के अनुरूप सेवाओं की पेशकश की जाएगी. इसमें उड़ान से पहले नमाज अदा करना, उड़ान के दौरान शराब या पोर्क से बने व्यंजन का परोसा नहीं जाना और एयर होस्टेस के लिए पोशाक के सख्त नियम शामिल हैं.
"हां, सुना तो है...पर इसका क्या मतलब हुआ..."
 मतलब ये हुआ कि अंग्रेज़ों ने हम पर हुकूमत की फूट डालो और शासन करो की नीति के तहत. अब यही काम राजनेता करते हैं. अगर हिंदुस्तान को वाकई तरक्की करना है, तो उसे हर तरह के ढकोसलों और ढोंग से मुक्ति पानी होगी. हिंदी परस्त होने का मतलब नहीं कि अंग्रेज़ी को गरियाएंगे. देशभक्त होने का मतलब ये नहीं कि सिर्फ दूसरे देशों से नफरत करेंगे. संस्कारी होने का मतलब ये नहीं कि दूसरों के अच्छे संस्कारों नहीं अपनाएंगे. 
"ई सब बात का अभी जो ठंड लग रही है, उससे का लेना-देना है?"
नहीं लेना-देना है, तो देखो जरा खिड़की के शीशे से बाहर. बारहपुल्ला का फ्लाईओवर उपर से निकल रहा है. सामान समेटो, निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन आने ही वाला है.

- समीर रंजन