Friday, November 22, 2013

तहलका अंदर का

कई मीडिया संस्थानों में काम करने के अनुभव की बदौलत यह स्वीकार करने में मुझे कतई गुरेज नहीं कि लगभग हर जगह दबी जुबान में वरिष्ठ मीडिया कर्मियों के यौन चरित्र के बारे में बातें की जाती हैं. बहुत संभावना है कि इन में से कुछ बातें सही भी रही हों, लेकिन ये भी उतना ही सही है कि मीडिया ही नहीं, हर छोटे-बड़े संस्थान में लोगों को बदनाम करने के लिए भी ऐसी मनगढ़ंत बातें फैलाई जाती हैं.

खैर, बात तरुण तेजपाल की करते हैं. जिस समय मैं पत्रकारिता का ककहारा सीख रहा था, लगभग उसी समय तहलका के नाम ने तहलका मचाना शुरू किया था. शायद जब मैं पत्रकारिता के स्नातक पाठ्यक्रम के तृतीय वर्ष में था, तभी तहलका मैग्जिन को लॉन्च करने की तैयारी चल रही थी. जाहिर है, तरुण तेजपाल उस समय मीडिया के हम नए रंगरूटों के आदर्श थे. पता चला कि तहलका 'क्रूसेडर्स' की बहाली कर रहा है. हमें लगा कि नौकरी पाने का इससे बेहतर मौका नहीं हो सकता. माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के नोएडा परिसर में पढ़ने वाले कुछ मित्रों के साथ तब मैं भी तहलका के दफ्तर गया था. वहीं पहली बार तरुण तेजपाल को साक्षात् देखा. बड़ी संक्षिप्त सी मुलाकात थी. मुलाकात भी नहीं कह सकता, बस एक छोटी सी बैठक थी, जिसका मैं श्रोता था. हमें बताया गया कि तहलका पहली मैग्जिन होगी, जो जनता के पैसे से छपेगी. क्योंकि निष्पक्ष, तटस्थ, पूर्वाग्रह मुक्त और तार्किक बने के रहने के लिए यह जरूरी है. उस वक्त ये बात मुझे बहुत जंची थी. पर थोड़ी निराशा भी हुई थी. कहां तो हम नौकरी पाने की लालसा और कुछ कर दिखाने के उत्साह से ओत-प्रोत होकर वहां गए थे, पर पता चला कि क्रूसेडर का तमगा पाकर भी हमें सेल्समैन का काम करना पड़ेगा. काम मिला कि घर-घर जाकर लोगों से तहलका का ईयरली सब्सक्रिप्शन खरीदने की अपील करनी है. अच्छी बास सिर्फ यही थी कि पत्रिका खरीदने के लिए लोगों पर दबाव डालने, उनके सामने गिड़गिड़ाने या जोर-जबर्दस्ती करने की सख्त मनाही थी.

चूंकि उस समय रक्षा सौदों में दलाली का प्रकरण ताजा-ताजा ही था इसलिए हमने नोएडा सेक्टर-22 में स्थित नौसेना के रिहाशी कॉलोनियों के घरों के दरवाजे ठकठकाने का निर्णय लिया. काम मन का था नहीं, इसलिए हम ज्यादा दिन तक नहीं कर पाए. लेकिन ये काम जितने दिन भी किया, सिर्फ और सिर्फ तरुण तेजपाल को अपना आदर्श मानने की वजह से किया.

मौजूदा घटना ने मन मंदिर में स्थापित उस आदर्श की छवि को चकनाचूर कर दिया है. कोई स्वीकारोक्ति या पश्चाताप उनके कुकृत्य की भरपाई नहीं कर सकता. खैर, मीडिया की दुनिया के अपने कई आदर्शों को मैं धूल चाटते देख चुका हूं. अब, तरुण तेजपाल का नाम भी ऐसे ही लोगों की फेहरिस्त में जुड़ गया है. अफसोस, अब एक और नाम मेरे जेहन में कभी भी तहलका नहीं मचा पाएगा.
 

No comments:

Post a Comment