Wednesday, May 12, 2010

निरूपमा का भूत


निरूपमा का भूत
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निरूपमा की हत्या की गई या उसने खुदकुशी की, इस रहस्य से अभी पर्दा नहीं उठ पाया है. शायद इसमें अभी कुछ और वक्त लगेगा. लेकिन निरूपमा की मौत के बाद पैदा हुआ भूत हर विजातीय प्रेमी जोड़े को डराने ज़रूर लगा है. मॉडर्न ज़माने के जोड़े जिस जात-पांत की खाई को पुराने ज़माने की चीज़ मानकर भूल से गए थे, जिनकी दिलचस्पी अपने पार्टनर का दिल का हाल जानने में ज्यादा थी, अब अपने लव पार्टनर की जाति डिस्कवर करने के बाद से आतंक के साये में जीने लगे हैं. अख़बार और न्यूज़ चैनलों पर निरूपमा और प्रियभांशु की पुरानी मुस्कुराती तस्वीरों में इन जोड़ों को अपने अक्स की परछाइयां नज़र आने लगी हैं. सड़ी-गली सामाजिक संरचनाओं के बजाए व्यक्तित्व और वयक्तिगत आर्थिक दशा को तरजीह देने और प्रभावी मानने वाला युवा वर्ग निरूपमा की मौत के बाद से सकते में हैं. उसे अपने पढ़े-लिखे मां-बाप भी संकीर्ण मानसिकता वाले जल्लाद सरीख़े नज़र आने लगे हैं. बेटे या बेटी की पसंद के ख़िलाफ जाकर मोटा दान-दहेज देकर स्वजातीय शादियां करवाने वाले मां-बाप का हठ इन युवाओं के लिए अबूझ पहेली बन गया है. मैनेजमेंट, साइंस या मैथमैटिक्स का कोई भी किताबी फॉर्मूला इस पहेली को सुलझाने में मददगार साबित नहीं हो रहा है. निरूपमा के पिता को टीवी स्क्रीन पर बेटी की मौत पर गमज़दा होने के बजाए सनातन धर्म के उपदेशों की बखिया उधेड़ते देखना, देश के युवाओं के लिए किसी हॉरर फिल्म को देखने के बाद होने वाले एहसास की तरह है. ख़ैर, मां-बाप और प्रेमी की बात छोड़िए, यहां तो कानून की रखवाली पुलिस और पोस्टमार्टम करने वाले सरकारी अस्पताल के कर्मचारी भी विलेन की भूमिका में नज़र आ रहे हैं. क़ानून पर भरोसा तो है, लेकिन समाज के धिनौने जर्म्स पहले भी जता चुके हैं कि उन्हें कानून की परवाह नहीं. हरियाणा की खाप जमात पहले भी कत्लेआम कर चुकी है और आगे के लिए आए दिन धमकाती भी रहती हैं. नेता और उनकी पार्टियां भी अगर वोट बैंक लूटने के चक्कर में इस खाप पंचायत के साथ प्यार की मांडवाली कर लें, तो कोई ताज्जुब नहीं होगा.
भूत भी दो मिजाज़ के होते हैं. अच्छे और बुरे. उम्मीद है अधूरे प्यार का दर्द लिए दुनिया से रूख्सत हुई निरूपमा का भूत अपनी अच्छाई के डर से सबको डराने में ज़रूर कामयाब होगा. एक शीतल पेय के विज्ञापन की पंच लाइन यहां लिखनी रेलीवेंट लगती है- क्योंकि डर आगे जीत है.

Monday, February 22, 2010

कोड़ा कांड में नया ख़ुलासा

एक बार फिर मधु कोड़ा घोटाला मामले में भाजपा नेता और जमशेदपुर पश्चिम विधानसभा सीट के पूर्व विधायक सरयू राय ने मीडिया के सामने बड़ा ख़ुलासा किया है. सरयू राय ने मीडिया को एक सत्रह मिनट लंबी एडिटेड ऑडियो सीडी जारी की है. सरयू राय का दावा है कि इस सीडी में मनोज पुनमिया की आवाज़ रिकॉर्ड की गई है. मनोज पुनमिया मधु कोड़ा घोटाला मामले में मुख्य अभियुक्त है. ये शख्स मूल रूप से मुम्बई का रहने वाला है और पेशे से सोनार है. पुनमिया से कोड़ा की पुरानी पहचान रही है. कोड़ा पहले भी गहने ख़रीदने के लिए इस शख्स से संपर्क साधते रहे हैं. सोमवार को जमशेदपुर में जारी की गई इस सीडी में कथित तौर पर मनोज पुनमिया की किसी बेनाम शख्स से साथ की गई बातचीत को रिकॉर्ड किया गया है. सीडी की ऑडियो क्वालिटी अच्छी नहीं है, लेकिन बातों ही बातों में पुनमिया ने अपने कई जुर्म क़बूले हैं. पुनमिया ने साफ तौर पर कोड़ा एंड कंपनी में शामिल सभी लोगों के लिए की गई ख़ातिरदारी का ज़िक्र किया है. पुनमिया ने ये भी बताया है कि कोड़ा एंड कंपनी ने कैसे उसके साथ डबल क्रॉस का गेम खेला और फिर उनके बीच आपस में ही अविश्वास पनपने लगा. मुम्बई का काम देखने वाले कोड़ा के इस गुर्गे ने आयकर निदेशक उज्ज्वल चौधरी को मैनेज न कर पाने की बात भी इस सीडी में क़बूल की है. उज्ज्वल चौधरी वही अधिकारी हैं, जिनका अचानक ट्रॉन्सफर किए जाने की वजह से इन दिनों झारखंड में बवाल मचा हुआ है. इसके अलावा पुनमिया ने ये भी बताया है कि न्यूक्लियर डील से ठीक पहले हवाला के तहत उसने करोड़ों रुपए एक विदेशी बैंक अकाउंट तक पहुंचाए थे. सरयू राय को ये ऑडियो ई-मेल के जरिए kapoorfilms@gmail.com की ई-मेल आईडी से भेजा गया है. ई-मेल भेजने वाले शख्स ने अपना नाम तरुण कपूर बताया है. अब सरयू चाहते हैं कि उन्हें भेजी गई ऑडियो फ़ाइल की फॉरेंसिक जांच कर इसकी सत्यता को परखा जाए. ये पता लगाया जाए कि ये आवाज़ वास्तव में मनोज पुनमिया की है या नहीं. और अगर जांच में ये साबित हो जाता है कि उन्हें भेजी गई आवाज़ पुनमिया की ही है, तो फिर इसका इस्तेमाल कोड़ा एंड कंपनी पर लगे आरोपों को साबित करने में किया जाए.


माई नेम इज़ ममता, एंड आई एम अड़ियल


ममता दीदी के लिए इस बार रेल बजट पेश करते हुए बिहार को बिल्कुल से नज़रअंदाज़ करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी होगा. बिहार में चुनावों की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है, ऐसे में जाहिर तौर पर कांग#ेस आलाकमान ने ममता पर बिहार पर मेहरबान होने का दबाव बनाया होगा. वैसे बंगाल में भी अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. इसलिए रेल बजट में बिहार औौर बंगाल पर होने वाली मेहरबानियों का राजनीतिक चश्मों से विशलेषण किया जाना तय है. इधर लालू अपना आजीवन रेल पास छिन जाने और जांच के चक#व्यूह में फंसाए जाने की वजह से ममता दीदी से पहले ही खार खाए बैठे हैं. इस बार भी अगर रेल बजट पेश करते हुए ममता और लालू के बीच की तीखी नोंक-झोंक देखने को मिल जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए. बिहार के मुख्यमंत#ी नीतीश कुमार पहले ही दीदी को अपनी नई रेलों की डिमांड लिस्ट सौंप चुके हैं. और इस लिस्ट की ज़रा सी भी उपेक्षा नीतीश बर्दाश्त करेंगे, ऐसा लगता नहीं. बजट में अगर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की दिशा में कोई ठोस संकेत नहीं दिखाई दिया तो नीतीश इन दोनों मुद्दों को जाहिर तौर पर चुनावी मंचों पर भंजाने का कोई मौका नहीं छोड़ेंगे. आम बिहारियों की बात करें, तो कोहरे के मौसम में रेलवे में मचने वाला कोहराम और जन आंदोलनों के नाम पर रेल पर पड़ने वाले पत्थरों और आगजनी की घटनाओं से निपटने के लिए दीदी क्या कदम उठाती हैं, इसपर सबकी निगाहें रहेंगी. इसके अलावा नक्सली इलाकों में आए दिन निशाना बनने वाली रेल और रेल पटरियों की सुरक्षा के लिए दीदी कुछ कर रही हैं या नहीं, ये जानने में भी हर किसी की दिलचस्पी होगी. लेकिन दिक्कत ये है कि ममता दबाव बनाने के लिए जानी जाती हैं, ना कि दबाव बर्दाश्त करने के लिए. इसलिए रेल बजट देखने-सुनने के बाद अगर वो माई नेम इज़ ममता, एंड आई एम अड़ियल टाइप का डायलॉग बोलती नज़र आएं, तो ताज्जुब नहीं होगा.