Sunday, September 20, 2009

"एई बोछेर कि आछे दादा"


इस साल क्या है, भइया? हर साल की तरह इस बार फिर दुर्गापूजा से ठीक पहले इस सवाल ने मेरे भीतर उधम मचाना शुरू कर दिया है. बचपन का बड़ा हिस्सा बंगाल के एक छोटे से शहर में बीता है. सो अब भी दुर्गापूजा का ज़िक्र आने पर वहां का सामुदायिक भवन और उसमें स्थापित होने वाली मां दुर्गा की प्रतिमा आंखों के आगे तैरने लगती है. पर मेरे मालगुड़ी टाइप के इस शहर की दुर्गापूजा को याद रखने की दूसरी कई वजहें भी हैं. ऐसी ही एक वजह हैं, मलय दा. मलय दा, द पेंटर. पतली-दुबली कदकाठी + पावर लेंस वाले चश्मे से ढंकी आंखें + खिचड़ी बाल + अधपकी दाढ़ी + बेतरतीब सा पहनावा = मलय दा का हुलिया. पर दादा की सबसे पक्की पहचान है, उनके चेहरे पर हरदम मौजूद रहने वाला दार्शनिकों वाला एक्सप्रेशन. मेरे मालगुड़ी में मलय दा और दुर्गापूजा को एक दूसरे का पर्याय माना जाता है. सामुदायिक भवन में होने वाली दुर्गापूजा की पूरी ज़िम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर होती है. कैसा पंडाल बनेगा, कैसी सजावट होगी, कैसी लाइटिंग होगी और यहां तक कि चंदे की रकम भी वही तय करते हैं. इतनी पूछ होने की वजह भी है. मेरे मालगुड़ी को अगर सेंटर मान लिया जाए, तो दस-बीस किलोमीटर की परिधि में दादा के टक्कर का कोई पेंटर अब तक पैदा नहीं हुआ है. इसलिए, दुर्गापूजा के मौके पर उनकी कलाकारी देखने दूर-दूर से लोग आते हैं. मलय दा भी अपनी ओर से कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते. दरअसल, दादा जो मूर्ति गढ़ते हैं, वो यों तो मां दुर्गा की आम प्रतिमा की तरह की ही होती है, लेकिन इस मूर्ति का बैकग्राउंड और उससे जुड़ी कई दूसरी दिलचस्प चीज़ें उसे बेहद ख़ास बना देती हैं. दादा जो बैकग्राउंड उकेरते हैं उसमें प्रजेन्ट टेन्स की झलक होती है. देश-दुनिया के संदर्भ में मौजूदा साल की कोई बड़ी घटना, कोई बड़ा हादसा या फिर कोई बड़ी कामयाबी उनके बैकग्राउंड का सब्जेक्ट बनती है. जुरासिक पार्क हिट होती है, तो मां दुर्गा भी जुरासिक एरा में डायनासुर का वध करती नज़र आती हैं. संसद पर हमला होती है, तो मां आतंकीसुर का नाश करती दिखाई देती हैं. पिछले साल बिहार में बाढ़ से मची तबाही के मंजर को मलय दा ने बैकग्राउंड का सब्जेक्ट चुना था. मतलब ये कि मलय दा दुर्गा पूजा को बिलकुल रेलिवेंट बना देते हैं. दुर्गा माई की प्रासंगिकता बढ़ा देते हैं. ये तो हुए दादा के काम के प्लस प्वाइंट्स. पर दादा के काम करने का तरीका भी कम निराला नहीं है. दादा अपने काम में जेम्स बॉन्डिया किस्म की सिक्रेसी मेनटेन करते हैं. दुर्गापूजा के आने की सुगबुगाहट हुई नहीं कि दादा के यहां-वहां दिखाई देने की प्रोबैब्लिटी डिक्रीज़ होनी शुरू हो जाती है. खुद को कम्युनिटी हॉल की चाहरदीवारी में नज़रबंद कर लेते हैं. बोलचाल-बातचीत सबकुछ बेहद लिमिटेड हो जाती है. मलय दा नहीं चाहते कि नियत समय से पहले किसी को उनके द्वारा तैयार किए जा रहे बैकग्राउंड का सब्जेक्ट पता चले. महालया के पंद्रह दिन पहले से ही कम्युनिटी हॉल बिल्कुल सीलबंद कर दिया जाता है. महालया के बाद तो उनके हेल्पर के भी भीतर जाने पर पाबंदी लग जाती है. कहने का मतलब ये कि मलय दा की परछाईं से भी अगर इस समय बैकग्राउंड के सब्जेक्ट के बारे में पूछा जाए, जो वो भी कंधे उचका देगी. बचपन में बैकग्राउंड का सिक्रेट जानने की मैंने कई कोशिशें कीं. मौका पाकर कम्युनिटी हॉल में ताक-झांक करने की कोशिश की, दादा के बाल-बच्चों को बिस्कुट-चॉकलेट खिलाकर इन्फॉर्मेशन हासिल करने की कोशिश की, कई बार तो सीधे-सीधे दादा से भी पूछा- "एई बोछेर कि आछे दादा". पर दादा की जुबान टस से मस नहीं हुई.खैर, मुझे दादा के इस तुगलकी और हिटलर किस्म के रुख को लेकर शिकायत है भी और नहीं भी. दरअसल, कलाकार की कला अनोखी तभी मानी जाती है, जब उसका कोई जोड़ न मिले. दादा भी अपनी रचना को कॉपी-पेस्ट किए जाने से बचाने के लिए ही ऐसा करते होंगे. पर मेरे पेट में तो आज भी बैकग्राउंड का सीक्रेट जानने के लिए मरोड़ें उठती हैं. अपने मालगुड़ी से कोई हजार-पंद्रह सौ किलोमीटर दूर बैठा मैं आज भी दादा के सब्जेक्ट की गेसिंग करने में लगा हूं. लालगढ़, सिंगूर, आइला, माइकल जैक्सन, सूखा, जेनरल इलैक्शन, आर्थिक मंदी जैसे कई विषय हैजो दिमाग में घुमड़ रहे हैं. पर असलियत का पता तो सप्तमी को ही चलेगा. जब मां की प्रतिमा पर से पर्दा हटाया जाएगा.

4 comments:

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  2. This post has taken me to our "MAALGUDI" city Chittaranjan..O boss seriously miss those years which i started mising since v left home to make our so called "Career" huhhh wayback in 2001.
    And this year too have some useless reason of some stupid exams going on which compelling not to be thr in CRJ...
    Maa Durga of "MALAY" artist e-specialy bless all of us 4m thr...wish could have been there :(
    Cheers,
    http://mukeshgiri.blogspot.com/

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  3. khubsurat chitrankan samir bhai.....
    apke malay da mujhe puri ke patnayak da ki jod ke lagte hian...aasha karta hu, unse 21 hi honge....khair agar kahin se unki kisi kalakriti ka photo bhi blog par upload kar do to maza aa jaaye....

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  4. chandmutthiashaar.blogspot.com kabhi mulahiza farmaiyega....

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