Sunday, September 13, 2009

स्लमडॉग की टांग


स्लमडॉग की टांग
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डियर डैनी बॉयल,
हाय, हैल्लो, नमस्ते ! (जो समझने में आसान लगे, उसी अभिवादन को स्वीकार करें)
मुझे पता है कि फ़ालतू की बकवास से अंग्रेज़ों को सख्त नफ़रत होती है. इसलिए सीधे-सीधे आपकी मतलब की बात पर आता हूं. मैं जानता हूं कि आजकल आप किसी दमदार स्क्रिप्ट की तलाश में हैं.मैं इस काम में आपके लिए काफी मददगार साबित हो सकता हूं. बिहार के बारे में तो आपने सुना ही होगा. अगर नहीं सुना है, तो बस इतना समझ लीजिए कि अगर धारावी असल भारत का ट्रेलर है, तो बिहार पूरी फिल्म है. अगर आप स्लमडॉग मिलेनियर (करोड़पति) का सीक्वल बनाने में इन्ट्रेस्टेड हैं, तो कहानी का प्लॉट पेश-ए-ख़िदमत है. बिल्कुल ताज़ा कहानी है. चौदह साल का एक कैरेक्टर है शहाबुद्दीन. ट्रेन का हॉकर. जो अमूमन बेटिकट ही ट्रेन पर सफर करते हुए अपनी चीज़ें बेचता है. बाप टीबी का पेशेन्ट है. घरवालों का पटे उसी की कमाई से भरता है. फिर एक दिन ग्वालियर एक्सप्रेस में सामान(चाय) बेचने के दौरान रेल पुलिस (सोनपुर) का एक हेड कॉन्सटेबल उसे पकड़ लेता है. बेटिकट यात्रा करने के इलज़ाम से छूटने के लिए उससे दस रुपए की रिश्वत की डिमांड की जाती है. शहाबुद्दीन इसे रूटीन डिमांड के तौर पर लेता है, और रुपए देने में आनाकानी करता है. इससे कॉन्सटेबल का पारा चढ़ जाता है. इतना कि वो शहाबुद्दीन को चलती ट्रेन से नीचे फेंक देता है. इसके बाद किसी की नज़र ट्रैक के किनारे ज़ख्मी पड़े शहाबुद्दीन पर पड़ती है...और उसे इलाज के लिएभागलपुर के सरकारी अस्पताल में भर्ती करवाया जाता है. यहां, लेडी सर्जन को शहाबुद्दीन की जान बचाने के लिए उसकी दाहिनी टांग काटनी पड़ती है. अभी तक की कहानी तो बस इतनी सी ही है. अधूरी है, पर मुझे पता है कि आपके अंदर इसे पूरी करने की पूरी क़ाबिलियत मौजूद है. आगे बस ट्रेज़डी ही तो दिखानी है. लतिका की एंट्री का स्कोप तो कम ही नज़र आता है, लेकिन गेम शो का ग्लैमर इस कहानी में भी गढ़ा जा सकता है. हो सकता है कि अपने कैरेक्टर शहाबुद्दीन को भी जेनरल नॉलेज की वो कई बातें पता हों, जो जेनरल लोगों की नॉलेज मेंनॉलेज में नहीं होती हैं. जैसे, रेल में बेटिकट यात्रा करते हुए पकड़े जाने पर कितने रुपए का जुर्माना या फिर कितने महीनों की सज़ा होती है. दस रुपए के नोट पर किसकी तस्वीर छपी होती है. डॉक्टर ऑपरेशन से पहले मरीज को बेहोश करने के लिए किस दवा का इस्तेमाल करता है. रेल पुलिस की वर्दी और टोपी का रंग कैसा होता है. अटेम्पट टू मर्डर के केस में आरोपी पर पुलिस आईपीसी की कौन सी धारा लगाती है. वगैरह-वगैरह. मतलब, ऐसे कई सवाल गढ़े जा सकते हैं. जिसके जवाब की आशा अब शहाबुद्दीन से की जा सकती है.उम्मीद है कि आपने इस कहानी में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी होगी. ज्यादा लेट करना मुनासिब भी नहीं होगा. क्योंकि सुना है कि अस्पताल में भर्ती शहाबुद्दीन को तुरंत ख़ून चढ़ाए जाने की ज़रूरत है. वर्ना उसकी जान जाने का ख़तरा है. सब जानते हैं कि जिस तरह से आपने स्लमडॉग मिलेनियर के बाल कलाकारों को घर दिलवाया, उसी तरह आप शहाबुद्दीन के लिए भी चुटकी बजाकर एक पल में ब्लड डोनर का इंतज़ाम कर सकते हैं. आप सोच रहे होंगे बाकी सब तो ठीक है, लेकिन इन सब बातों से मेरा कौन सा इंट्रेस्ट जुड़ा हुआ है. लेट मी क्लियर, शहाबुद्दीन की रियल और रील लाइफ की इंडिंग कैसी होगी, ये फैसला अब आपके हाथों में है. रील लाइफ की इंडिंग चाहे कैसी भी हो, मुझे एतराज़ नहीं है. पर मैं उसकी रियल लाइफ में खुशियों को दोबारा लौटते हुए देखना चाहता हूं. अगर आप तैयार हैं, तो इस कहानी को एडॉप्ट करने के लिए मोस्ट वेलकम, वर्ना भांड में जाए आपकी फिल्म.

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