Monday, September 7, 2009

मालामाल ईमानदारली


बड़े-बुजुर्ग एक बड़ा पुराना जुमला इस्तेमाल किया करते थे. पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब, खेलोगे-कुदोगे तो होगे खराब. पर फोर्ब्स मैग्जिन की ताज़ा जारी लिस्ट तो यही इशारा करती है कि ये जुमला अब बिल्कुल पिट चुका है. शायद ही किसी नवाब की एनुअल इनकम धौनी के बराबर की रही होगी. अभी फिलहाल मैं नवाबों के होम टाउन हैदराबाद में हूं और इससे पहले धौनी के होम टाउन रांची में काम किया करता था. इसलिए इस बारे में राय देने की छोटी सी हिमाकत तो मैं कर ही सकता हूं. रिची रिच की कार्टून फिल्में भी मैंने खूब चाव से देखी हैं. आज माही और रिची रिच में मुझे कोई फ़र्क नज़र नहीं आता है. दोनों मालामाल हैं. फोर्ब्स के आंकड़ों पर भी मुझे कोई संदेह नहीं है. पर बुजुर्गों के जुमले को बिल्कुल पिटा हुआ कहने पर मुझे एतराज़ है. जिस रांची के धौनी हैं, वहीं उनके साथ खेलने वाले उनके कई गुमनाम दोस्तों के नाम मैं जानता हूं. जिस रांची के धौनी हैं, वहीं की राष्ट्रीय महिला हॉकी टीम की प्लेयर रही सुमराय टेटे को भी मैं जानता हूं. जो अब भी टूर्नामेंट खेलकर लौटने पर रांची से घर वापस जाने के लिए टेकर(बड़ी जीप) वालों से भाड़े के लिए जिरह करती हैं. यानि हर खेलने वाला नवाब नहीं है. क्रिकेट के अलावा दूसरा खेल खेलने वाला भी नवाब नहीं है. दरअसल, नवाब बनना एक ख्वाब है. ये ख्वाब हक़ीकत बने, इसके लिए जरूरी नहीं कि आप क्रिकेट ही खेलें. नवाब बनने के कई दूसरे लीगल तरीक़े भी हैं. खेल में रूचि होना कोई बुरी बात नहीं है. ना ही खेल को करियर बनाना कोई ऐब की बात है. पर जबरन और देखा-देखी किसी खेल के लिए पागलपन पालना फ़िजूल है. नॉलेज और नॉलेजिबल बंदों की अभी भी कद्र है. कला और कलाकारों की भी कद्र है. बिज़नेस और कारोबारियों की भी कद्र है. वर्ना सारा देश अब्दुल कलाम को सैल्यूट नहीं करता, वर्ना हर कोई हुसैन की पेंटिंग्स और रूशदी की क़िताबों में नहीं खोता, वर्ना टाटा-बिड़ला-अंबानी की ताक़त को कम करके आंका जाता. हर फील्ड के अपने-अपने नवाब हैं. कई नए नवाब तो नए फील्ड गढ़कर उसे ही अपना गढ़ बना लेते हैं. मतलब ये कि जब ख्वाबों की कोई कमी नहीं है, तो फिर नवाबों की कमी कैसे हो सकती है. एक दिक्कत और है. हम क़ामयाब शख्सियत के रुतबे और उसकी रसूख से तो इम्प्रेस होते हैं, लेकिन इस क़ामयाबी के पीछ छिपी मेहनत, लगन, आत्मविश्वास और स्ट्रगल को नज़रअंदाज़ कर जाते हैं. जबकि सच्चाई ये है कि जीवन के किसी भी पल में किसी की भी लॉटरी लग सकती है. आपका काम, आपकी ईमानदारी और आपका भाग्य आपको रंक से राजा बना सकता है. लब्बो-लुआब ये कि ईमानदारली भी मालामाल हुआ जा सकता है.

1 comment:

  1. Really nice sameer, as always......Its good dat u r still continuing it!!

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