Monday, August 31, 2009

सल्लू भाई को सलाह


सल्लू भाई को सलाह
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सल्लू भाई, आदाब!
आप आईपीएल में इनवेस्ट करने की सोच रहे हैं...ये जानकर मेंरी स्माइल किंग्स इलेवेन पंजाब की मालकिन प्रीति ज़िंटा की गड्ढों वाली स्माइल से मैच कर गई है. गड्ढे तो नाइट राइडर्स वाले शाहरुख के गालों पर भी बनते हैं...लेकिन क्रिकेट के कॉन्टेक्सट में मैं शाहरुख से अपनी तुलना नहीं करना चाहता. इस बाज़ीगर को कॉमन अंजाम का डर है. खैर जाने दीजिए, मेरा मन तो बस इतना ही सुनकर गार्डन-गार्डन हो गया है कि अब आप क्रिकेट से भी लगान वसूलेंगे. पर सल्लू भाई, आप बुरा न माने तो एक सवाल पूछूं, आपका क्रिकेट में अचानक इतना इंट्रेस्ट कैसे जग गया. कहीं कैटरीना की वजह से तो नहीं. शायद पिछली बार बंगलुरू वाली विजय माल्या की टीम रॉयल चैलेंजर्स को चियर अप करने गई कैटरीना ने ही आपको इस इनवेस्टमेंट के बारे में सजेस्ट किया है. यही बात है न...अपने ब्राइट फ्यूचर के लिए अगर फ्यूचर ब्राइड कोई सजेशन दे...तो इसमें हर्ज ही क्या है. खैर, अब सीधे-सीधे मुद्दे की बात पर आता हूं. अपने-आपके फायदे की बात करते हैं. सोच रहा हूं कि आईपीएल के लिहाज से तो सारे मेट्रो शहर पहले ही बुक हो चुके हैं. सबकी अपनी-अपनी टीमें बन चुकी हैं. सो आपको पटना रॉयल रंगदार्स नाम की टीम बनाने का आइडिया देना चाहता हूं. पटना में बहुत स्कोप है. इस स्कोप को भुनाना ज़रूरी है. रांची के पास धौनी है, जमशेदपुर के पास सौरभ तिवारी है, पर पटना कीर्ति आज़ाद और सबा करीम की कीर्ति से कब का आज़ाद हो चुका है. मतलब क्रिकेट के मामले में फिलहाल पटना कंगाल है. बिहारी होने के नाते इस कंगाली को दूर करना मेरी नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है. इसलिए सल्लू भाई आपको बिन मांगी सलाह देने की जुर्रत कर रहा हूं. पटना रॉयल रंगदार्स के कई फ़ायदे हैं. पहला फायदा तो यही है कि यहां कैप्टन खोजने के ज्यादा मगजमारी करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. लालू जी का छोरा खूब क्रिकेट खेलता है. कैप्टन बनाने से बाप-बेटे की बदौलत टीम को अच्छी पब्लिसिटी और ढेर सारे स्पॉन्सर इज़ली मिल जाएंगे. आगे कोई पॉलिटिकल बाधा आई, तो उसे सॉल्व करने में भी आसानी होगी. लालू साथ होंगे तो नीतीश अगेन्सट में चले जाएंगे ऐसा भी नहीं है. सूखे और बाढ़ की मार खाकर सरकार को गरियाती जनता को मनाने के लिए क्रिकेट से अच्छा लॉलीपॉप नहीं मिलेगा...इतना तो नीतीश भी जानते हैं. विकास की बाउंड्री के भीतर क्रिकेट भी आता है...ये बात लोगों को उतनी ही आसानी से समझाई जा सकती है...जितनी आसानी से उन्हें जात-पांत के नाम पर बरगलाया जा सकता है. फैन्स खोजने का भी कोई झंझट नहीं है. पटना-बिहार के लोग कितने ग्लोबल हो चुके हैं, ये आपको भी पता है. और तो और बिहार वालों को लेकर क्षेत्र विशेष के लोगों के भीतर उठने वाली चिढ़ का भी फ़ायदा उठाया जा सकता है. मसलन, मुम्बई इंडियंस और पटना रॉयल रंगदार्स के बीच खेले जाने वाले मैच को भारत-पाकिस्तान मैच की तर्ज पर हाइप देना आसान होगा. मैदान, मैनेजमेंट, इन्फ्रास्ट्रक्चर और अकोमोडेशन को लेकर एकाध छोटे-छोटे झंझट हैं, लेकिन उनका भी उपाय है. जैसे आतंकवाद के नाम पर मैच की जगह बदल दी जाती है, उसी तरह यहां नक्सलवाद के नाम पर मैच की जगह कभी भी बदल सकने की छूट होगी. मार्केट को भी ये सारी चीज़ें आसानी से समझायी जा सकती हैं...बस, सल्लू भाई समझ लीजिए कि यही मौका है चौका मारने का. सलाह भली लगे तो मानने में देर मत कीजिएगा.
आपका शुभचिंतक