Sunday, September 20, 2009

"एई बोछेर कि आछे दादा"


इस साल क्या है, भइया? हर साल की तरह इस बार फिर दुर्गापूजा से ठीक पहले इस सवाल ने मेरे भीतर उधम मचाना शुरू कर दिया है. बचपन का बड़ा हिस्सा बंगाल के एक छोटे से शहर में बीता है. सो अब भी दुर्गापूजा का ज़िक्र आने पर वहां का सामुदायिक भवन और उसमें स्थापित होने वाली मां दुर्गा की प्रतिमा आंखों के आगे तैरने लगती है. पर मेरे मालगुड़ी टाइप के इस शहर की दुर्गापूजा को याद रखने की दूसरी कई वजहें भी हैं. ऐसी ही एक वजह हैं, मलय दा. मलय दा, द पेंटर. पतली-दुबली कदकाठी + पावर लेंस वाले चश्मे से ढंकी आंखें + खिचड़ी बाल + अधपकी दाढ़ी + बेतरतीब सा पहनावा = मलय दा का हुलिया. पर दादा की सबसे पक्की पहचान है, उनके चेहरे पर हरदम मौजूद रहने वाला दार्शनिकों वाला एक्सप्रेशन. मेरे मालगुड़ी में मलय दा और दुर्गापूजा को एक दूसरे का पर्याय माना जाता है. सामुदायिक भवन में होने वाली दुर्गापूजा की पूरी ज़िम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर होती है. कैसा पंडाल बनेगा, कैसी सजावट होगी, कैसी लाइटिंग होगी और यहां तक कि चंदे की रकम भी वही तय करते हैं. इतनी पूछ होने की वजह भी है. मेरे मालगुड़ी को अगर सेंटर मान लिया जाए, तो दस-बीस किलोमीटर की परिधि में दादा के टक्कर का कोई पेंटर अब तक पैदा नहीं हुआ है. इसलिए, दुर्गापूजा के मौके पर उनकी कलाकारी देखने दूर-दूर से लोग आते हैं. मलय दा भी अपनी ओर से कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते. दरअसल, दादा जो मूर्ति गढ़ते हैं, वो यों तो मां दुर्गा की आम प्रतिमा की तरह की ही होती है, लेकिन इस मूर्ति का बैकग्राउंड और उससे जुड़ी कई दूसरी दिलचस्प चीज़ें उसे बेहद ख़ास बना देती हैं. दादा जो बैकग्राउंड उकेरते हैं उसमें प्रजेन्ट टेन्स की झलक होती है. देश-दुनिया के संदर्भ में मौजूदा साल की कोई बड़ी घटना, कोई बड़ा हादसा या फिर कोई बड़ी कामयाबी उनके बैकग्राउंड का सब्जेक्ट बनती है. जुरासिक पार्क हिट होती है, तो मां दुर्गा भी जुरासिक एरा में डायनासुर का वध करती नज़र आती हैं. संसद पर हमला होती है, तो मां आतंकीसुर का नाश करती दिखाई देती हैं. पिछले साल बिहार में बाढ़ से मची तबाही के मंजर को मलय दा ने बैकग्राउंड का सब्जेक्ट चुना था. मतलब ये कि मलय दा दुर्गा पूजा को बिलकुल रेलिवेंट बना देते हैं. दुर्गा माई की प्रासंगिकता बढ़ा देते हैं. ये तो हुए दादा के काम के प्लस प्वाइंट्स. पर दादा के काम करने का तरीका भी कम निराला नहीं है. दादा अपने काम में जेम्स बॉन्डिया किस्म की सिक्रेसी मेनटेन करते हैं. दुर्गापूजा के आने की सुगबुगाहट हुई नहीं कि दादा के यहां-वहां दिखाई देने की प्रोबैब्लिटी डिक्रीज़ होनी शुरू हो जाती है. खुद को कम्युनिटी हॉल की चाहरदीवारी में नज़रबंद कर लेते हैं. बोलचाल-बातचीत सबकुछ बेहद लिमिटेड हो जाती है. मलय दा नहीं चाहते कि नियत समय से पहले किसी को उनके द्वारा तैयार किए जा रहे बैकग्राउंड का सब्जेक्ट पता चले. महालया के पंद्रह दिन पहले से ही कम्युनिटी हॉल बिल्कुल सीलबंद कर दिया जाता है. महालया के बाद तो उनके हेल्पर के भी भीतर जाने पर पाबंदी लग जाती है. कहने का मतलब ये कि मलय दा की परछाईं से भी अगर इस समय बैकग्राउंड के सब्जेक्ट के बारे में पूछा जाए, जो वो भी कंधे उचका देगी. बचपन में बैकग्राउंड का सिक्रेट जानने की मैंने कई कोशिशें कीं. मौका पाकर कम्युनिटी हॉल में ताक-झांक करने की कोशिश की, दादा के बाल-बच्चों को बिस्कुट-चॉकलेट खिलाकर इन्फॉर्मेशन हासिल करने की कोशिश की, कई बार तो सीधे-सीधे दादा से भी पूछा- "एई बोछेर कि आछे दादा". पर दादा की जुबान टस से मस नहीं हुई.खैर, मुझे दादा के इस तुगलकी और हिटलर किस्म के रुख को लेकर शिकायत है भी और नहीं भी. दरअसल, कलाकार की कला अनोखी तभी मानी जाती है, जब उसका कोई जोड़ न मिले. दादा भी अपनी रचना को कॉपी-पेस्ट किए जाने से बचाने के लिए ही ऐसा करते होंगे. पर मेरे पेट में तो आज भी बैकग्राउंड का सीक्रेट जानने के लिए मरोड़ें उठती हैं. अपने मालगुड़ी से कोई हजार-पंद्रह सौ किलोमीटर दूर बैठा मैं आज भी दादा के सब्जेक्ट की गेसिंग करने में लगा हूं. लालगढ़, सिंगूर, आइला, माइकल जैक्सन, सूखा, जेनरल इलैक्शन, आर्थिक मंदी जैसे कई विषय हैजो दिमाग में घुमड़ रहे हैं. पर असलियत का पता तो सप्तमी को ही चलेगा. जब मां की प्रतिमा पर से पर्दा हटाया जाएगा.

Thursday, September 17, 2009

राजनीति पर रैबिज का ख़तरा


हम और आप आम हैं. इम्तियाज अली की भाषा में मैंगो पीपुल. मेरा बस चले तो संविधान की प्रस्तावना की स्टार्टिंग लाइन के " वी द पीपुल" में भी संशोधन करके इसे " वी द मैंगो पीपुल" में बदल दूं. लेकिन ऐसा करने के लिए मुझे आम से ख़ास होना पड़ेगा. और अगर भूल-चूक से एक बार मैं ख़ास बन गया, तो फिर भला मैं आम की परवाह क्यों करूंगा. संविधान से छेड़-छाड़ तो फिर भी की जा सकती है, लेकिन राजनीति की मूल अवधारणा से छेड़खानी करना मेरे बस का नहीं है. एक बार गांधी बाबा ने ऐसा अटैम्पट लिया था. धर्म और राजनीति को जोड़कर एक सेनटेन्स कहा था. लेकिन ख़ास लोगों ने इस सेनटेन्स की ऐसी बखिया उधेड़ी कि आम के दिमाग का मैंगो शेक बन गया. अभी सुना कि कांग्रेस आलाकमान ने अपने मंत्रियों से खर्च में कटौती करने को कहा है. आलाकमान और कई आला नेताओं ने इकनॉमी क्लास में हवाई सफर कर बाकियों पर दबाव बढ़ा दिया है. राहुल बाबा भी ट्रेन से घूम रहे हैं. ये बात अलग है कि कुछ नामुरादों ने उनकी बोगी पर पत्थर फेंक कर अपने नापाक इरादों की झलक दिखा दी है. पर मुझे तो कुछ दूसरा ही डर सता रहा है. राजनीति की मूल अवधारणा से हो रही इस छेड़खानी ने मेरी नींद उड़ा दी है. दरअसल, आम आदमी को सपने देखने की लत होती है. आम आदमी मुंगेरी लाल होता है और दिक्कत ये है कि वो हमेशा हसीन सपने ही देखता है. आम आदमी ऐसा कार्टून कैरेक्टर होता है, जो आर.के लक्ष्मण के कार्टून से भी कुछ नहीं सीखता. अमां यार कितनी बार तो सेंसेक्स औंधे मुंह गिया और सरपट उपर चढ़ा. लेकिन दलाल स्ट्रीट के आगे बैठे भिखारी का ना तो कुछ बिगड़ा और ना ही कुछ सुधरा. अब इस मौजूदा छेड़-छाड़ से आम को लगता है कि ख़ास की अक्ल ठिकाने पर आ गई है. पर आम आदमी भूल जाता है कि जैसे आम की कई वैराइटी होती हैं, उसी तरह ख़ास की भी कई वेराइटी हैं. कुछ ख़ास, कुत्ते की दुम से इंसपायर्ड होते हैं. किसी ने दुम सीधी करने की हिमाकत की नहीं, कि बिल्कुल कटखने बन जाते हैं. कई बार तो ख़ास की जमात वालों को भी काटने में गुरेज नहीं करते हैं. नतीजा ये होता है कि राजनीति में रैबिज फैलने लगता है. फिर या तो पीड़ित ख़ास को लॉन्ग ट्रीटमेंट से गुजरना पड़ता है, या फिर रैबिज के बुरे असर से वो भी काटने वालों की सुर से सुर मिलाकर भौंकना शुरू कर देता है. पर आम की सोच पर तो ताला जड़ा है. वो यही सोच कर खुश है कि चलो ख़ास भी अब आम की राह पर चलने की सोच रहा है. वो आम ऐसा सोचता है, जिसके लिए सवारी का मतलब अब भी साइकिल, रिक्शा, तांगा, नाव, बस और लोकल ट्रेन जैसी चीज़े ही हैं. वो आम ऐसा सोचता है, जो अब भी मंजिल तक पहुंचने के रास्ते का ज्यादातर सफर पैदल ही तय करता है. वो आम ऐसा सोचता है, जो शायद अब भी अक्ल से पैदल (माफ कीजिएगा) है.

Monday, September 14, 2009

मां की भाषा- हिंदी


मेरी मां को सौभाग्य से थोड़ा पढ़ने-लिखने का मौका मिल गया था. इसलिए अच्छी हिंदी पढ़-लिख और समझ लेती है. हिंदी साहित्य और हिंदी फिल्मों में भी मां की रूचि से मैं परिचित हूं. अपने छुटपन की कई कविता-कहानियां भी उसे अब तक याद हैं. ये बात भी मैं शर्तिया तौर पर कह सकता हूं कि वो आज भी पिता की तुलना में कहीं ज्यादा सटीक तरीके से किसी गूढ़ अर्थ वाली कविता का भावार्थ-प्रतिकार्थ समझ और समझा सकती है. व्याकरण और अलंकारों की भले ही ज्यादा समझ उसे न हो, लेकिन वो उम्दा और औसत साहित्य में बहुत अच्छी तरह फ़र्क कर सकती है. ये मां की ही परछाईं का असर है कि आज मैं भी इस क़ाबिल हूं कि हिंदी के किसी अपरिचित शब्द से पाला पड़ने पर भी मैं उसका उच्चारण करने में अटकता नहीं हूं. दूसरों की नज़र में क्लिष्ट और जटिल जान पड़ने वाले शब्द भी मुझे परेशान नहीं करते हैं. दूसरों को रिझाने लायक थोड़ा-बहुत लिख भी लेता हूं. मतलब, हिंदी से प्यार करना मुझे मां ने ही सिखाया. इसलिए मां कभी भी मम्मी या मॉम भी नहीं बन पाई. पर अब मन में कई बार ये सवाल पैदा होता है कि क्या मां पर समय और देशकाल का असर रहा होगा. पर इस सवाल का पक्का जवाब घंटों सर खपाने पर भी नहीं मिलता. अंग्रेज़ी तो तब भी थी. मां, शहर में ही पली-बढ़ी है. फिर भी उस पर अंग्रेज़ी का जादू क्यों नहीं चला? फिर मां कि उम्र बीस-पच्चीस साल घटाकर उसके बारे में सोचता हूं. सोचता हूं कि अगर वो आज के दौर में होती तो क्या हिंदी को लेकर उसकी दीवानगी ऐसी ही होती. तब, एक काल्पनिक रूप में मां सामने आकर खड़ी हो जाती है. मां के उस रूप को मॉम कहना ज्यादा उचित होगा. देखता हूं कि मॉम इंग्लिश स्पीकिंग का कोर्स कर रही है. मेरे कॉन्वेंट स्कूल की पैरेन्ट्स मीटिंग में भद्द पिटने से बचने के लिए. टीवी सीरियल और फिल्मों के डायलॉग समझने के लिए. अपने एडवांस मोबाइल के फीचर्स सही तरीके से इस्तेमाल करने के लिए. इंटरनेट की कम्युनिटी और सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों पर अपनी सखियों की खोज-ख़बर लेने के लिए. बाज़ार में टंगे होर्डिंग-बैनरों के ब्रांडेड विज्ञापनों के ऑफर समझने के लिए. दरवाजे पर रोज़ाना आने वाली सेल्सगर्ल्स के सामने मोलभाव करते हुए ऑक्वर्ड फील करने से बचने के लिए. इस बदले रूप में मां बड़ी अजीब लगती है. मॉम बनी मां के दिल में झांकने पर और भी ताज्जुब होता है. वो अब भी हिंदी के साथ कम्फर्टेबल फील करती है. मेरी हिंदी टीचर से ही वो खुलकर मेरे बारे में अपनी चिंता शेयर कर पाती है. गुलज़ार और प्रसून जोशी के लिखे टफ टाइप गाने भी वो सहजता से गुनगुनाती है. उसके एसएमएस, चैटिंग और स्क्रैप की लिपि भले ही रोमन हो, लेकिन भाषा अब भी हिंदी ही है. जिस ऑटो या रिक्शे पर चढ़कर वो बाज़ार जाती है, उसे चलाने वाला अब भी लेफ्ट और राइट टर्न का मतलब नहीं समझता है. वो अब भी अमेरिकन इंग्लिश में धड़ल्ले से इस्तेमाल होने वाले स्लैंग शब्दों को सुनकर झेंप जाती है. वो अब भी बड़ों को आप की जगह यू कह कर संबोधित करने में अटकती है. पर पता नहीं क्यों, मॉम ना तो अपने अंदर की हिंदी की छाया मुझ पर पड़ने देना चाहती है और ना ही इसकी भनक किसी और को लगने देना चाहती है.

Sunday, September 13, 2009

स्लमडॉग की टांग


स्लमडॉग की टांग
-----------------------
डियर डैनी बॉयल,
हाय, हैल्लो, नमस्ते ! (जो समझने में आसान लगे, उसी अभिवादन को स्वीकार करें)
मुझे पता है कि फ़ालतू की बकवास से अंग्रेज़ों को सख्त नफ़रत होती है. इसलिए सीधे-सीधे आपकी मतलब की बात पर आता हूं. मैं जानता हूं कि आजकल आप किसी दमदार स्क्रिप्ट की तलाश में हैं.मैं इस काम में आपके लिए काफी मददगार साबित हो सकता हूं. बिहार के बारे में तो आपने सुना ही होगा. अगर नहीं सुना है, तो बस इतना समझ लीजिए कि अगर धारावी असल भारत का ट्रेलर है, तो बिहार पूरी फिल्म है. अगर आप स्लमडॉग मिलेनियर (करोड़पति) का सीक्वल बनाने में इन्ट्रेस्टेड हैं, तो कहानी का प्लॉट पेश-ए-ख़िदमत है. बिल्कुल ताज़ा कहानी है. चौदह साल का एक कैरेक्टर है शहाबुद्दीन. ट्रेन का हॉकर. जो अमूमन बेटिकट ही ट्रेन पर सफर करते हुए अपनी चीज़ें बेचता है. बाप टीबी का पेशेन्ट है. घरवालों का पटे उसी की कमाई से भरता है. फिर एक दिन ग्वालियर एक्सप्रेस में सामान(चाय) बेचने के दौरान रेल पुलिस (सोनपुर) का एक हेड कॉन्सटेबल उसे पकड़ लेता है. बेटिकट यात्रा करने के इलज़ाम से छूटने के लिए उससे दस रुपए की रिश्वत की डिमांड की जाती है. शहाबुद्दीन इसे रूटीन डिमांड के तौर पर लेता है, और रुपए देने में आनाकानी करता है. इससे कॉन्सटेबल का पारा चढ़ जाता है. इतना कि वो शहाबुद्दीन को चलती ट्रेन से नीचे फेंक देता है. इसके बाद किसी की नज़र ट्रैक के किनारे ज़ख्मी पड़े शहाबुद्दीन पर पड़ती है...और उसे इलाज के लिएभागलपुर के सरकारी अस्पताल में भर्ती करवाया जाता है. यहां, लेडी सर्जन को शहाबुद्दीन की जान बचाने के लिए उसकी दाहिनी टांग काटनी पड़ती है. अभी तक की कहानी तो बस इतनी सी ही है. अधूरी है, पर मुझे पता है कि आपके अंदर इसे पूरी करने की पूरी क़ाबिलियत मौजूद है. आगे बस ट्रेज़डी ही तो दिखानी है. लतिका की एंट्री का स्कोप तो कम ही नज़र आता है, लेकिन गेम शो का ग्लैमर इस कहानी में भी गढ़ा जा सकता है. हो सकता है कि अपने कैरेक्टर शहाबुद्दीन को भी जेनरल नॉलेज की वो कई बातें पता हों, जो जेनरल लोगों की नॉलेज मेंनॉलेज में नहीं होती हैं. जैसे, रेल में बेटिकट यात्रा करते हुए पकड़े जाने पर कितने रुपए का जुर्माना या फिर कितने महीनों की सज़ा होती है. दस रुपए के नोट पर किसकी तस्वीर छपी होती है. डॉक्टर ऑपरेशन से पहले मरीज को बेहोश करने के लिए किस दवा का इस्तेमाल करता है. रेल पुलिस की वर्दी और टोपी का रंग कैसा होता है. अटेम्पट टू मर्डर के केस में आरोपी पर पुलिस आईपीसी की कौन सी धारा लगाती है. वगैरह-वगैरह. मतलब, ऐसे कई सवाल गढ़े जा सकते हैं. जिसके जवाब की आशा अब शहाबुद्दीन से की जा सकती है.उम्मीद है कि आपने इस कहानी में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी होगी. ज्यादा लेट करना मुनासिब भी नहीं होगा. क्योंकि सुना है कि अस्पताल में भर्ती शहाबुद्दीन को तुरंत ख़ून चढ़ाए जाने की ज़रूरत है. वर्ना उसकी जान जाने का ख़तरा है. सब जानते हैं कि जिस तरह से आपने स्लमडॉग मिलेनियर के बाल कलाकारों को घर दिलवाया, उसी तरह आप शहाबुद्दीन के लिए भी चुटकी बजाकर एक पल में ब्लड डोनर का इंतज़ाम कर सकते हैं. आप सोच रहे होंगे बाकी सब तो ठीक है, लेकिन इन सब बातों से मेरा कौन सा इंट्रेस्ट जुड़ा हुआ है. लेट मी क्लियर, शहाबुद्दीन की रियल और रील लाइफ की इंडिंग कैसी होगी, ये फैसला अब आपके हाथों में है. रील लाइफ की इंडिंग चाहे कैसी भी हो, मुझे एतराज़ नहीं है. पर मैं उसकी रियल लाइफ में खुशियों को दोबारा लौटते हुए देखना चाहता हूं. अगर आप तैयार हैं, तो इस कहानी को एडॉप्ट करने के लिए मोस्ट वेलकम, वर्ना भांड में जाए आपकी फिल्म.

Monday, September 7, 2009

मालामाल ईमानदारली


बड़े-बुजुर्ग एक बड़ा पुराना जुमला इस्तेमाल किया करते थे. पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब, खेलोगे-कुदोगे तो होगे खराब. पर फोर्ब्स मैग्जिन की ताज़ा जारी लिस्ट तो यही इशारा करती है कि ये जुमला अब बिल्कुल पिट चुका है. शायद ही किसी नवाब की एनुअल इनकम धौनी के बराबर की रही होगी. अभी फिलहाल मैं नवाबों के होम टाउन हैदराबाद में हूं और इससे पहले धौनी के होम टाउन रांची में काम किया करता था. इसलिए इस बारे में राय देने की छोटी सी हिमाकत तो मैं कर ही सकता हूं. रिची रिच की कार्टून फिल्में भी मैंने खूब चाव से देखी हैं. आज माही और रिची रिच में मुझे कोई फ़र्क नज़र नहीं आता है. दोनों मालामाल हैं. फोर्ब्स के आंकड़ों पर भी मुझे कोई संदेह नहीं है. पर बुजुर्गों के जुमले को बिल्कुल पिटा हुआ कहने पर मुझे एतराज़ है. जिस रांची के धौनी हैं, वहीं उनके साथ खेलने वाले उनके कई गुमनाम दोस्तों के नाम मैं जानता हूं. जिस रांची के धौनी हैं, वहीं की राष्ट्रीय महिला हॉकी टीम की प्लेयर रही सुमराय टेटे को भी मैं जानता हूं. जो अब भी टूर्नामेंट खेलकर लौटने पर रांची से घर वापस जाने के लिए टेकर(बड़ी जीप) वालों से भाड़े के लिए जिरह करती हैं. यानि हर खेलने वाला नवाब नहीं है. क्रिकेट के अलावा दूसरा खेल खेलने वाला भी नवाब नहीं है. दरअसल, नवाब बनना एक ख्वाब है. ये ख्वाब हक़ीकत बने, इसके लिए जरूरी नहीं कि आप क्रिकेट ही खेलें. नवाब बनने के कई दूसरे लीगल तरीक़े भी हैं. खेल में रूचि होना कोई बुरी बात नहीं है. ना ही खेल को करियर बनाना कोई ऐब की बात है. पर जबरन और देखा-देखी किसी खेल के लिए पागलपन पालना फ़िजूल है. नॉलेज और नॉलेजिबल बंदों की अभी भी कद्र है. कला और कलाकारों की भी कद्र है. बिज़नेस और कारोबारियों की भी कद्र है. वर्ना सारा देश अब्दुल कलाम को सैल्यूट नहीं करता, वर्ना हर कोई हुसैन की पेंटिंग्स और रूशदी की क़िताबों में नहीं खोता, वर्ना टाटा-बिड़ला-अंबानी की ताक़त को कम करके आंका जाता. हर फील्ड के अपने-अपने नवाब हैं. कई नए नवाब तो नए फील्ड गढ़कर उसे ही अपना गढ़ बना लेते हैं. मतलब ये कि जब ख्वाबों की कोई कमी नहीं है, तो फिर नवाबों की कमी कैसे हो सकती है. एक दिक्कत और है. हम क़ामयाब शख्सियत के रुतबे और उसकी रसूख से तो इम्प्रेस होते हैं, लेकिन इस क़ामयाबी के पीछ छिपी मेहनत, लगन, आत्मविश्वास और स्ट्रगल को नज़रअंदाज़ कर जाते हैं. जबकि सच्चाई ये है कि जीवन के किसी भी पल में किसी की भी लॉटरी लग सकती है. आपका काम, आपकी ईमानदारी और आपका भाग्य आपको रंक से राजा बना सकता है. लब्बो-लुआब ये कि ईमानदारली भी मालामाल हुआ जा सकता है.

Tuesday, September 1, 2009

बड़ी मछली और छोटी मछली


बड़ी मछली और छोटी मछली
-------------------------
बंसी कांटे से मछली पकड़ने के शॉर्ट एक्सपीरियंस के बेस पर इतना तो जानता ही हूं कि बड़ी मछली आसानी से पकड़ में नहीं आती ह. बड़ी मछली को जीवन का तजुर्बा ज्यादा होता है...वो जानती है कि कहां जाल बिछा है और उससे कैसे बचना है. फिर बड़ी मछली को एकाध इंच का केंचुआ या कंचे के साइज़ वाली आटे के गोली उतनी अट्रैक्टिव भी नहीं लगती होगी. सोचती होगी कि इससे मेरा क्या होगा !
पर अगर अपने शिकार सेक्टर में मंदी की वजह से छोटा हाथ मारने के चक्कर में बड़ी मछली पकड़ में आ भी जाए तो उसके लास्ट मोमेंट तक हाथ से फिसल जाने के चांसेज़ ज्यादा होते हैं। बड़ी मछली का वेट आपका कांटा तोड़ सकता है...फिर बड़ी मछली के पास इतनी ताक़त तो होती ही है कि वो थोड़ा-बहुत हाथ-पैर मारकर आपके कांटे से आज़ाद हो सके। इसलिए बड़ी मछली को पकड़ने के लिए आपका लक्की होना एकमात्र इशेंशियल क्वालिफिकेशन है. हां, अगर आप इन बॉक्स देखकर एसएमएस भांप लेने वाले और मरीज़ की नब्ज टटोले बगैर स्वाइन फ्लू का वायरस पहचान सकने वाली क़ाबिलियत रखते हैं...तो बात अलग है. तो आप एक्सेप्शनल केस हैं. वन इन मिलियन टाइप के. एक और कैटेगरी का ज़िक्र करना यहां बेहद ज़रूरी है. ये नॉट एप्लिकेबल वाली कैटेगरी है. अगर आप पुलिस सेवा, सीबीआई या फिर क्राइम कंट्रोल से संबंध रखने वाले ऐसे ही किसी संस्थान से जुड़े हैं, तो आप अपने जीवन में कभी भी बड़ी मछली नहीं पकड़ सकते हैं. हां, छोटी मछलियों से आपकी झोली हमेशा लबालब भरी रहेगी. आपने अगर लक्कीली बड़ी मछली पकड़ भी ली, तो वो नैनो सेकेंड के लिए आपके पास रहेगी. दरअसल, आपके योग में बड़ी मछली को पकड़ना लिखा ही नहीं है. ये बात अलग है कि आप ताउम्र इसी फ़िराक में होंगे कि कब बड़ी मछली पकड़ में आए. पर बावजूद इसके आपको चिंता करने की ज़रूरत नहीं है. आप चाहें तो छोटी मछली को बड़ा बनाकर प्रोजेक्ट कर सकते हैं. या फिर किसी छोटी मछली को अपने कंट्रोल में रखकर उसे बड़ा कर सकते हैं...और बाद में उसके बड़ी मछली बन जाने पर उसे ही पकड़ कर क्रेडिट ले सकते हैं. ये फ़ियर फ़ैक्टर भी अपने दिल से निकाल दीजिए कि ऐसा करने से आपकी क्रेडिब्लिटी घट जाएगी. सरकार मत्स्य पालकों को हमेशा सपोर्ट करती है. आप सोच रहे होंगे कि अगर ऐसा है तो फिर आपको प्रधानमंत्री ने बड़ी मछली पकड़ने के लिए क्यों कहा है. बड़ी सिम्पल सी बात है. कुछ बड़ी मछलियां अपनी साइज़ की औक़ात से ज़्यादा गंध फैलाने लगती हैं. जिन छोटी मछलियों के अंदर बड़ा होने का पोटेंशियल होता है, उन्हें ही निगलने की धमकी देने लगती हैं. तब मजबूरी में सरकार को इन मछलियों को पकड़ने और काबू में लाने की जुगत भिड़ानी पड़ती है. इसलिए आपको टेंशन लेने की ज़रूरत नहीं है. आपको तो केवल क्रेडिट लेना है. बाकि का काम सरकार खुद कर लेगी. सरकार के पास अभेद जालों की कोई कमी नहीं है. दरअसल, भूल से मैंनै आपको एक टॉप सीक्रेट अब तक नहीं बताया है. वो जो मैंने पहले वन इन मिलियन वाली कैटेगरी का ज़िक्र किया था ना...दरअसल उसी category वाले लोगों के संगठन को सरकार कहा जाता है। ये पब्लिक साइंस की परिभाषा है , याद रखियेगा .

Monday, August 31, 2009

सल्लू भाई को सलाह


सल्लू भाई को सलाह
--------------------------
सल्लू भाई, आदाब!
आप आईपीएल में इनवेस्ट करने की सोच रहे हैं...ये जानकर मेंरी स्माइल किंग्स इलेवेन पंजाब की मालकिन प्रीति ज़िंटा की गड्ढों वाली स्माइल से मैच कर गई है. गड्ढे तो नाइट राइडर्स वाले शाहरुख के गालों पर भी बनते हैं...लेकिन क्रिकेट के कॉन्टेक्सट में मैं शाहरुख से अपनी तुलना नहीं करना चाहता. इस बाज़ीगर को कॉमन अंजाम का डर है. खैर जाने दीजिए, मेरा मन तो बस इतना ही सुनकर गार्डन-गार्डन हो गया है कि अब आप क्रिकेट से भी लगान वसूलेंगे. पर सल्लू भाई, आप बुरा न माने तो एक सवाल पूछूं, आपका क्रिकेट में अचानक इतना इंट्रेस्ट कैसे जग गया. कहीं कैटरीना की वजह से तो नहीं. शायद पिछली बार बंगलुरू वाली विजय माल्या की टीम रॉयल चैलेंजर्स को चियर अप करने गई कैटरीना ने ही आपको इस इनवेस्टमेंट के बारे में सजेस्ट किया है. यही बात है न...अपने ब्राइट फ्यूचर के लिए अगर फ्यूचर ब्राइड कोई सजेशन दे...तो इसमें हर्ज ही क्या है. खैर, अब सीधे-सीधे मुद्दे की बात पर आता हूं. अपने-आपके फायदे की बात करते हैं. सोच रहा हूं कि आईपीएल के लिहाज से तो सारे मेट्रो शहर पहले ही बुक हो चुके हैं. सबकी अपनी-अपनी टीमें बन चुकी हैं. सो आपको पटना रॉयल रंगदार्स नाम की टीम बनाने का आइडिया देना चाहता हूं. पटना में बहुत स्कोप है. इस स्कोप को भुनाना ज़रूरी है. रांची के पास धौनी है, जमशेदपुर के पास सौरभ तिवारी है, पर पटना कीर्ति आज़ाद और सबा करीम की कीर्ति से कब का आज़ाद हो चुका है. मतलब क्रिकेट के मामले में फिलहाल पटना कंगाल है. बिहारी होने के नाते इस कंगाली को दूर करना मेरी नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है. इसलिए सल्लू भाई आपको बिन मांगी सलाह देने की जुर्रत कर रहा हूं. पटना रॉयल रंगदार्स के कई फ़ायदे हैं. पहला फायदा तो यही है कि यहां कैप्टन खोजने के ज्यादा मगजमारी करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. लालू जी का छोरा खूब क्रिकेट खेलता है. कैप्टन बनाने से बाप-बेटे की बदौलत टीम को अच्छी पब्लिसिटी और ढेर सारे स्पॉन्सर इज़ली मिल जाएंगे. आगे कोई पॉलिटिकल बाधा आई, तो उसे सॉल्व करने में भी आसानी होगी. लालू साथ होंगे तो नीतीश अगेन्सट में चले जाएंगे ऐसा भी नहीं है. सूखे और बाढ़ की मार खाकर सरकार को गरियाती जनता को मनाने के लिए क्रिकेट से अच्छा लॉलीपॉप नहीं मिलेगा...इतना तो नीतीश भी जानते हैं. विकास की बाउंड्री के भीतर क्रिकेट भी आता है...ये बात लोगों को उतनी ही आसानी से समझाई जा सकती है...जितनी आसानी से उन्हें जात-पांत के नाम पर बरगलाया जा सकता है. फैन्स खोजने का भी कोई झंझट नहीं है. पटना-बिहार के लोग कितने ग्लोबल हो चुके हैं, ये आपको भी पता है. और तो और बिहार वालों को लेकर क्षेत्र विशेष के लोगों के भीतर उठने वाली चिढ़ का भी फ़ायदा उठाया जा सकता है. मसलन, मुम्बई इंडियंस और पटना रॉयल रंगदार्स के बीच खेले जाने वाले मैच को भारत-पाकिस्तान मैच की तर्ज पर हाइप देना आसान होगा. मैदान, मैनेजमेंट, इन्फ्रास्ट्रक्चर और अकोमोडेशन को लेकर एकाध छोटे-छोटे झंझट हैं, लेकिन उनका भी उपाय है. जैसे आतंकवाद के नाम पर मैच की जगह बदल दी जाती है, उसी तरह यहां नक्सलवाद के नाम पर मैच की जगह कभी भी बदल सकने की छूट होगी. मार्केट को भी ये सारी चीज़ें आसानी से समझायी जा सकती हैं...बस, सल्लू भाई समझ लीजिए कि यही मौका है चौका मारने का. सलाह भली लगे तो मानने में देर मत कीजिएगा.
आपका शुभचिंतक