Monday, August 20, 2018

ठोको गाली

वैसे Siddhu पाजी POK के राष्ट्रपति को जानते भी थे या नहीं? किसी न्यूज़ चैनल ने उनसे ये सवाल पूछा भी है या नहीं? सवाल तो शायद किसी न्यूज़ चैनल से भी नहीं पूछ गया होगा कि जब पूरा देश अपने एक पूर्व प्रधानमंत्री के निधन पर शोक मना रहा है और देश के एक सूबे में प्रलयंकारी बाढ़ आई हुई है, तब आप उस Siddhu की पाकिस्तान यात्रा की चर्चा में इतना समय क्यूं खपा रहे हैं, जो न तो सरकार के प्रतिनिधि बन कर वहां गए थे और ना ही अपनी मौजूदा पार्टी के नेता के तौर पर।
वैसे एक सवाल तो आपसे भी पूछा जाना चाहिए- क्या शोक में किसी को गालियां दी जा सकती हैं? (विषयांतर का खतरा है, इसलिए पीटने और पिटाई के औचित्य पर सवाल नहीं पूछूंगा।)
अभी ज़्यादा वक्त नहीं गुज़रा है, जब Siddhu बिल्कुल नए रूप में क्रिकेट मैच के फ़ायरब्रांड कमेंटेटर के रूप में टीवी पर अवतरित हुए थे। उनकी फ़ायरब्रांड वाली ये छवि तब और चमकदार हो जाती थी, जब वो इंडिया-पाकिस्तान के किसी मैच में माइक थाम के लगभग दोयम दर्ज़े की तुकबंदियां करते हुए राष्ट्रवाद की मार्केटिंग करते थे। आज जो लोग उनको बिना सांस लिए गालियां बक रहे हैं, वही कल तक उछल-उछल कर उनकी तुकबंदियों पर तालियां बजाया करते थे।
फिर जब Siddhu कॉमेडी नाइट विद कपिल के जज बनकर आए और उटपटांग जोक पर भी मुंह फाड़-फाड़ के ठहाके मारने लगे, तो धीरे-धीरे गंभीर लोगों ने उन्हें गंभीरता से लेना बंद कर दिया। तब तो हद ही हो गई, जब Siddhu कंटेस्टेंट बनकर Big Boss में भी पहुंच गए। इससे ये ज़ाहिर हो चुका था कि Siddhu अब किसी भी तरह खुद को चर्चा में रखना चाहते हैं।
उनकी फ़ायरब्रांड कमेंटेटर वाली छवि का फायदा उठाने के लिए भाजपा ने उन्हें अपने साथ जोड़ा। लेकिन तब तक तो Siddhu खुद को ही ब्रांड मानने लगे थे। इसलिए भाजपा से उनकी यारी ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाई।
भाजपा से उनकी बढ़ती दूरियों का लाभ उठाने की कोशिश आम आदमी पार्टी और कांग्रेस दोनों ने की, लेकिन सफलता कांग्रेस को मिली।
खुद को ब्रांड मान चुके Siddhu अब दरअसल किसी भी दल या समूह की सीमा को लांघ चुके हैं। कम से कम Siddhu तो ऐसा ही मानते हैं। इसलिए, जब कपिल देव और गवास्कर जैसे क्रिकेटर इमरान ख़ान का न्योता अस्वीकार कर देते हैं, तब भी Siddhu न्योता स्वीकार करने का खतरा मोल लेते हैं। अभी देश के मिजाज़ में यह समीकरण फिट कर दिया गया है कि सरकार की नीतियों का विरोध करने वाले शख्स को मुसलमान या पाकिस्तान के खांचे में ठेल दिया जाए। ऐसे समय में Siddhu का पाकिस्तान जाने का न्योता स्वीकार करना 'आ बैल मुझे मार' जैसा ही था। हालांकि, वहां Siddhu सरकार की किसी नीति का विरोध करने नहीं जा रहे थे। उनका गुनाह बस इतना है कि वे पाकिस्तान जा रहे थे।
बात सिर्फ़ इतनी सी है कि न्यूज़ चैनलों ने ये मौका लपक लिया है। वो दूरदर्शन की तर्ज़ पर सात दिन तक सारंगीवादन नहीं कर सकते। अटल जी की कविताएं उन्हें टीआरपी नहीं दिला सकतीं। इसलिए, जब इमरान के शपथ ग्रहण समारोह में Siddhu को पीछे से उठाकर पहली पंक्ति में बिठाया गया, तब भी हमारे देसी न्यूज़ चैनलों ने 'देश के अपमान' लायक मसाला ढूंढ ही लिया। जबकि सच तो ये है कि Siddhu चाहे जिसके भी बगल में बैठते, उनकी उपस्थिति का विश्लेषण 'एक खास तरीके' से ही होना तय था। पाकिस्तान के सेना प्रमुख बाजवा के साथ Siddhu ने गले मिलकर मीडिया को वो तस्वीर भी उपलब्ध करवा दी, जिस पर कई दिनों तक हो-हल्ला मचाने लायक मसाला तैयार किया जा सकता है।
जबकि बाजवा भारत के पूर्व सेनाध्यक्ष मेजर जनरल बिक्रम सिंह के अधीन दो साल (2012 से 2014 तक) कांगो में काम कर चुके हैं। यूएन पीस मिशन के तहत बाजवा की ओर से किए गए अच्छे काम की सराहना मेजर बिक्रम भी सार्वजनिक रूप से कर चुके हैं। लेकिन, उस वक्त मेजर बिक्रम की आलोचना शायद इसलिए नहीं हुई, क्योंकि तब सरकार दूसरी थी। मेजर बिक्रम शायद इसलिए भी मीडिया की आलोचना के दायरे से बाहर रहे, क्योंकि वे उस सेना का हिस्सा रहे हैं जिसकी सार्वजनिक आलोचना न करने की अघोषित परंपरा रही है।
इतने पर भी अगर आपको मीडिया की मौकापरस्त भूमिका पर यकीन नहीं होता तो इस ताज़ा उदाहरण पर नज़र दौड़ाएं-
अभी एक न्यूज़ चैनल की रिपोर्ट देखी, जिसमें Siddhu को पाकिस्तान में जूते की किसी दुकान से जूते खरीदते हुए दिखाया जा रहा था। चैनल का एंकर उनपर इस बात पर पिला पड़ा था कि जब देश वाजपेयी जी के निधन पर शोकाकुल है, तब ये आदमी शॉपिंग कैसे कर रहा है!

सच के पास वाला झूठ

साल 2015 में रिलीज़ हुई फ़िल्म 'डिटेक्टिव व्यमोकेश बक्शी' का एक डायलॉग मुझे आज रह-रह के याद आ रहा है। फिल्म का नायक एक सीन में कहता है- "सच के आस-पास वाला 'झूठ' पकड़ना मुश्किल होता है।"
'नाली के कचरे से गैस बनाने' का जो मामला आजकल सोशल मीडिया की फिज़ाओं में तैर रहा है, वह दुर्भाग्य से इसी डायलॉग की परिधि में आता है। आगे बढ़ने से पहले, ज़रा प्रधानमंत्री के संबोधन का वो अंश फिर से पढ़िए जिसके पक्ष और विपक्ष में मोर्चे बांध के ट्रोलिंग की जा रही है।
पीएम ने कहा, 'मैंने एक बार अखबार में पढ़ा था, किसी छोटे से नगर में एक नाले के पास कोई चाय का ठेला लेकर खड़ा रहता था और चाय बेचता था. जब चाय बनाने की बात आती है तो मेरा ध्यान थोड़ा जल्दी जाता है (इस पर कार्यक्रम में मौजूद सभी लोग तालियां बजाते हुए हंस पड़े).'
पीएम ने आगे कहा, 'वहीं पर गंदी नाली चलती थी. उसके दिमाग में एक विचार आया. स्वाभाविक है कि गंदी नाली में गैस भी निकलती है. दुर्गंध भी आती थी. उसने एक बर्तन को उल्टा करके, उसमें छेद करके एक पाइप डाल दिया और जो गटर से गैस निकलती थी उसे अपने चाय के ठेले पर ले लिया. इसके बाद वह इसी गैस से चाय बनाने लगा. सिंपल सी टेक्नोलॉजी है.'
जैसा कि आप जानते हैं पीएम के इस संबोधन का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो चुका है। कुछ लोगों ने (जिसमें मैं भी शामिल था) नाली के कचरे से गैस बनाए जाने की बात पर सवाल खड़े किए। इसके जवाब में कुछ लोग पहले 'द हिंदू' अख़बार की एक रिपोर्ट को यहां-वहां चस्पां करके पीएम की बात को सही साबित करने की कोशिश करते नज़र आए। जबकि 'द हिंदू' की रिपोर्ट में 'मानव मल' से बायो गैस बनाने की बात कही गई थी। ये 'गोबर गैस' जैसा ही प्रयोग है, जिसे लगभग असफल या अव्यवहारिक मानकर अस्सी के दशक में ही दरकिनार किया जा चुका है। हालांकि, ये सच है कि आज भी कुछ जगहों पर बायोगैस का इस्तेमाल ईंधन के तौर पर होता है। पर ये नाली के कचरे से गैस बनाने के दावे से बिल्कुल अलग चीज़ है।
इसके बाद 'छत्तीसगढ़ ख़बर' नाम की एक वेबसाइट में साल 2014 में छपी एक रिपोर्ट को साझा किया जाने लगा। रिपोर्ट पढ़ने पर साफ़ ज़ाहिर होता है कि लिखने वाले की विज्ञान की समझ कमज़ोर रही होगी। वरना रिपोर्ट में गंधहीन मीथेन की तुलना एलपीजी की विशेष गंध से नहीं की जाती। खैर, उस वक्त तक गूगल 'नाली', 'कचरा' 'गैस' जैसे कीवर्ड डालने पर इसी रिपोर्ट का लिंक दिखा रहा था। शायद इसी रिपोर्ट को पढ़ने के बाद 'सबसे तेज़' चैनल ने तेज़ी दिखाई और उस 'श्याम राव शिर्के' को खोज निकाला, जिनका नाम रिपोर्ट में लिया गया था।
'आज तक' चैनल की आधिकारिक वेबसाइट पर जो ताज़ा रिपोर्ट छापी गई है, उसकी ये लाइनें पढ़िए-
1. श्याम राव शिर्के के इस प्रोजेक्ट की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी तारीफ की है.
(जबकि, प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहीं भी श्याम राव शिर्के का नाम नहीं लिया है।)
2. रायपुर के चंगोराभाठा इलाके में रहने वाले 60 वर्षीय श्याम राव शिर्के का नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जुबान पर है.
(एक बार फिर झूठा दावा किया गया है।)
अब सबसे ज़रूरी और मज़ेदार बात। 'आजतक' की इसी ताज़ा रिपोर्ट में श्याम राव शिर्के जी का विस्तार से परिचय देते हुए ये पंक्ति लिखी गई हैै-
"वे 11वीं पास हैं. आय का कोई विशेष साधन नहीं है. उनकी आजीविका मैकेनिकल कॉन्ट्रैक्टरशिप पर निर्भर है."
ज़ाहिर है, रिपोर्ट लिखने वाला खुद बता रहा है कि श्याम राव जी का न कभी कोई 'चाय का ठेला' रहा है और न ही उन्होंने कभी 'चाय' बेची है। 'छत्तीसगढ़ ख़बर' में छपी पुरानी रिपोर्ट में भी कहा गया है कि श्याम राव जी के घर के पास बदबूदार नाले में खुदाई चल रही थी, जहां से उन्हें गैस बनाने का ख्याल आया।
चैनल ने श्याम राव जी के इंटरव्यू का एक वीडियो भी जारी किया है। जिसमें श्याम राव हाथ में एक रेखाचित्र लेकर बैठे हैं और अपने प्रोजेक्ट की कार्यप्रणाली के बारे में बता रहे हैं। यह 'बर्तन उल्टा करके छेद में पाइप डालने' जैसा आसान तो कतई नहीं लगता। (पोस्ट के साथ दी गई तस्वीर देखें।)
यानी प्रधानमंत्री अपने संबोधन में कम से कम श्याम राव जी की बात तो नहीं ही कर रहे थे। ज़ाहिर है चैनल ने एक झूठ परोसा है, जिसे सोशल मीडिया के आम यूजर्स के साथ-साथ दूसरे समाचार माध्यम भी फ़ॉलो कर रहे हैं।
इस बीच फ़ेसबुक के साथी और राजस्थान पत्रिका के वरिष्ठ पत्रकार Awesh Tiwari जी ने अपनी एक हालिया पोस्ट में लिखा है-
"मेरे एक मित्र है आईसीएसआर में वरिष्ठ वैज्ञानिक है मोदी भक्त भी है। कल अचानक फोन आया तो हमने पूछा कि यार यह गटर की गैस से चाय बनाने वाला आइडिया दिया कौन था? उन्होंने बताया कि किसी वैज्ञानिक ने नही दिया था आज तक के एक पत्रकार महोदय ने दिया था। उन्होंने इसके आगे और भी चौकाने वाली बात बताई । उन्होंने कहा कि चूंकि पीएम ने बोल दिया है इसलिए आइसीएसआर को शुक्रवार को एक पत्र भेजकर कहा गया है कि इसकी संभावना तलाशे कि गटर की गैस का व्यवसायिक इस्तेमाल कैसे हो? यह पायलट प्रोजेक्ट सबसे पहले बनारस में शुरू करने को कहा गया है इसके लिए वैज्ञानिकों की टीम अगले सप्ताह तक गठित हो जाएगी जो गैर पारंपरिक ऊर्जा मंत्रालय के अधीन काम करेगी। हम बोले यार ,गैस तो पारम्परिक है वो हंस दिए। फोन कटा तो मैं सोचा यह पत्रकार भी क्या क्या बुद्धि देते हैं।"
फिर भी मान लेते हैं कि प्रधानमंत्री जी ने जो किस्सा सुनाया है, वो वाकई सच्चा था। तो ऐसे में सवाल उठता है कि 'स्वच्छ भारत अभियान' के नाम पर देश की जनता से जो 'सेस' वसूला गया, क्या वह बेईमानी था? सरकार ने लोगों से कचरे के इस तरह के इस्तेमाल की अपील क्यों नहीं की? नाली के कचरे से बायोगैस बनाने की अवधारणा को वास्तविकता के धरातल पर लागू करने के लिए अब तक कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाया गया? सबसे बड़ी बात कि जब प्रधानमंत्री ऐसी कोई युक्ति जानते थे, तो उन्होंने अब तक इसे अपने भाषण के लिए संजो कर क्यों रखा?

Thursday, August 9, 2018

आखिर हार ही गए हरिवंश जी!

ये इसी देश में हो सकता है कि अलग देश की मांग के साथ राजनीति शुरू करने वाले व्यक्ति की मौत पर चौतरफ़ा मातम फैल जाए। वैसे भी मौत के बाद किसी को भी कोसना यहां पाप माना जाता है। फिर अगर मौत किसी रसूखदार या सत्ताभोगी इंसान की हुई हो, तो आपसे उसकी आलोचना का अधिकार भी इसी नैतिकता के नाम पर छीन लिया जाता है। इस तरह मौत के बाद इस देश में हर कोई देवता हो जाता है।
पर आज हम एक 'जीवित मृतक' की बात करेंगे। दरअसल, हम भारतीय एक ऐसी वैश्विक परंपरा का भी हिस्सा बन चुके हैं, जिसका मानना है कि 'उगते सूरज को सलाम करना चाहिए।' हालांकि, बिहार-झारखंड में बिना पंड़ित-पुरोहित और मंत्रोचारण के होने वाले छठ महापर्व में 'डूबते सूरज' को आज भी पूजा जाता है। यानी कि मैं जिस समाज में पैदा हुआ, उसमें सफल-असफल दोनों तरह की ताकतों को एक समान सम्मान देने का चलन रहा है। लेकिन, अब शायद हम बस इस चलन का निर्वाह करते हैं, हमारी वास्तविक मान्यताएं बदल चुकी हैं।
हरिवंश जी को राज्यसभा का उप-सभापति बनाया गया है। इसके बाद जिस तरह से उनके व्यक्तित्व की तारीफ़ में कसीदे काढ़े जा रहे हैं, वह हमारी बदलती मान्यताओं का प्रमाण हैं। आगे कुछ भी लिखने से पहले यह साफ करना ज़रूरी है कि हरिवंश जी मेरे भी प्रिय संपादक रहे हैं और रांची में पत्रकारिता करते हुए मैंने प्रभात ख़बर की सफलता को बेहद करीब से देखा है। इसलिए, मेरे लिखे को किसी तरह का लांछन मानने के बजाय सामयिक समीक्षा या आलोचना मानकर पढ़ा जाए।
जिस दौर में प्रभात ख़बर धनराज (धनबाद, रांची, जमशेदपुर) में तेजी से लोकप्रिय हो रहा था, वो समय झारखंड में घोर राजनीतिक अस्थिरता का था। बाबूलाल मरांडी की कुर्सी मूलवासी आंदोलन से उपजी हिंसा की भेंट चढ़ चुकी थी। सत्ता कभी मधु कोड़ा के हाथ का खिलौना बन जाती, तो कभी अर्जुन मुंडा के हाथ का। ज़ाहिर है, झारखंड की राजनीति पर केंद्रित मीडिया के पास लिखने-बताने के लिए काफ़ी कुछ था। हरिवंश जी ने भी सत्ता और राजनीति की इस उठा-पटक के बारे में खूब लिखा। इस तरह देखते ही देखते झारखंड में प्रभात खबर की लोकप्रियता शीर्ष पर पहुंच गई। हालांकि, प्रभात ख़बर को मिली कामयाबी के पीछे स्थानीय ख़बरों को बढ़ावा देने की नीति का भी बहुत योगदान रहा।
राज्यसभा में हरिवंश जी की तारीफ़ में प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी ने संक्षेप में वो सबकुछ कहा, जो हरिवंश जी की जीत पर उन्हें उम्मीदवार बनाने वाले गठबंधन के मुखिया को कहना चाहिए था। संसद, पीएम और कुछ हद तक मीडिया का यह स्टैंड समझ में आता है। लेकिन, पब्लिक डोमेन में कई बार ऐसा उत्सव का माहौल बना दिया जाता है कि ज़रूरी बातों पर चर्चा तक नहीं हो पाती।
आज जबकि हरिवंश जी की खामोशी पर भी चर्चा होनी चाहिए थी। उनकी और उनके अख़बार की उस चुप्पी पर भी बात होनी चाहिए थी, जो नीतीश कुमार के दूसरे शासनकाल (26 नवंबर, 2010 से लेकर 17 मई, 2014 तक) के दौरान सबको चुभी थी। यह क्यों न माना जाए कि इसी चुप्पी के लिए उन्हें राज्यसभा भेजकर उपकृत भी किया गया।
बीती बातों को छोड़कर आज के संदर्भ में भी अगर हरिवंश जी की जीत की समीक्षा की जाए, तो हरिवंश जी की तारीफ़ में कही गई सारी बातें बेइमानी लगने लगती हैं। आज जब पूरे बिहार की जनता 'मुज़फ़्फरपुर के महापाप' पर शर्मिंदा है। नीतीश कुमार के नेतृत्व की कमजोरी पर चौतरफ़ा उंगलियां उठ रही हैं। ऐसे मुश्किल वक्त में नैतिकता का तकाज़ा कहता था कि हरिवंश जी फिर से कलम सम्हालते। अपने मित्र की आलोचना करके सच्ची मित्रता निभाते। यह साबित कर देते कि उनके बारे में कही गई सारी बातें आज भी उतनी ही सच्ची हैं, जितनी कल थीं। लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। ये नैतिक बल वो दिखा नहीं पाए। यही हरिवंश जी की हार है।

Sunday, August 5, 2018

द फ़्रेंडशिप टेस्ट (पहली कड़ी)

बहुत समय बाद की बात है। तब इस कहानी को पढ़ने वाले सभी लोग मर चुके थे। उस काल में इंसानियत की रक्षा की ज़िम्मेदारी भी बाकी चीज़ों की तरह स्मार्ट और ऑटोमेटेड मशीनों को सौंप दी गई थी। रिश्तों की उम्र मापने वाले सॉफ़्टवेयर आ चुके थे और लोगों ने अपनी सहज बुद्धि (instinct) पर यकीन करना छोड़ दिया था। समाज ने रिलेशनशिप में नए-नए रिस्क लेने वालों और कॉम्प्रमाइज़ करने वालों को मनोरोगी मान कर इलाज के लिए 'रिहैब होम' भेज दिया था। बच्चों को दोस्ती करने की मनाही थी, केवल 18 साल से अधिक की उम्र के लोगों को ही फ्रेंड बनाने का हक दिया गया था।
 देश के बाकी नौजवानों की तरह ही जब उन दोनों के बीच दोस्ती की शुरुआत हुई, तो उन्हें अपने रिश्ते की मंज़ूरी के लिए आवेदन देना पड़ा। इसके बाद सॉफ़्टवेयर टेस्ट की तारीख मुकर्रर हुई और दोनों बेसब्री से उस दिन का इंतज़ार करने लगे। घरवालों की शुभकामनाएं लेकर वो दोनों टेस्ट के लिए पहुंचे।
टेस्ट की प्रक्रिया बहुत लंबी थी। सबसे पहले एक लंबा-चौड़ा ऑनलाइन फ़ॉर्म भरना था। उम्र, लिंग, राष्ट्रीयता, रंग, जाति, धर्म, भाषा, प्रदेश आदि जैसे कई अनिवार्य कॉलम थे। अपनी राजनीतिक विचारधारा और पसंदीदा राजनेता के साथ-साथ उन मसलों के बारे में विस्तार से बताना ज़रूरी था, जिनसे आवेदक प्रभावित रहा है। इसके अलावा पसंदीदा रंग, भोजन, तीर्थस्थान, धार्मिक पुस्तक, लेखक, कवि, अभिनेता से लेकर देवी-देवताओं के बारे में बताना भी ज़रूरी था। अगर आवेदक की पसंद में बदलाव हुआ है, तो उसके संबंध में जानकारी देने के लिए भी अलग से एक कॉलम था।
दोनों को 'फ़्रेंडशिप अप्रूवल फ़ॉर्म' के इस अजीबोगरीब फ़ॉर्मेट को लेकर थोड़ा ताज्जुब तो हुआ, पर जैसे-तैसे फ़ॉर्म भरकर वो दूसरे चरण तक पहुंचे। इस चरण में दोनों के अलग-अलग कंप्यूटराइज़्ड इंटरव्यू हुए। उनसे सामान्य से लेकर निहायत ही अटपटे सवाल पूछे गए। जैसे उनसे पूछा गया कि अगर उनकी दोस्ती टूटती है, तो वे क्या करेंगे? एक सवाल ये भी था कि अगर दोस्ती टूटने के कई साल बाद दोनों का आमना-सामना होता है, तो फिर एक-दूसरे के प्रति उनका व्यवहार कैसा होगा?
तीसरे और आखिरी चरण में उनकी शारीरिक खूबियों और खामियों का मिलान किया गया। दोनों की चुस्ती-फ़ुर्ती, ताकत, वजन, लंबाई, शारीरिक बनावट से लेकर जेनेटिक जानकारियों का विश्लेषण किया गया।
अंत में उनके सोशल प्रोफ़ाइल की क्लाउड मेमोरी में टेस्ट की रिपोर्ट की कॉपी सेव कर दी गई। दोनों जल्द से जल्द टेस्ट का रिजल्ट जानना चाहते थे। आशंका और उम्मीद की मिली-जुली भावना के साथ उन्होंने एक बड़े से मॉनिटर पर एक साथ टेस्ट रिजल्ट देखना शुरू किया।
टेस्ट का रिजल्ट पॉज़िटिव था। उनके दरम्यान पनप रहे रिश्ते को कंप्यूटर सॉफ़्टवेयर ने 95% कॉम्पैटिबल माना था। दोनों ने खुशी से उछल कर हाई-फ़ाइव के अंदाज़ में हाथ मिलाया। तभी कंप्यूटर से जुड़े आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस हार्डवेयर से एक मशीनी आवाज़ निकली- 'आप दोनों को अब एक-दूसरे को गले लगाने का अधिकार मिल चुका है।' इतना सुनते ही दोनों ने एक-दूसरे को अपनी बाहों में भरकर भींच लिया। दोनों कई मिनटों तक यूं ही एक-दूसरे से लिपटे रहे। तभी 'पिंग' की एक आवाज़ हुई और दोनों वर्तमान में लौट आए। कंप्यूटर की स्क्रीन पर एक बटन ब्लिंक कर रहा था, जिस पर लिखा था- "अधिक जानें"
एक बार फिर दोनों कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बैठे थे। पल भर के लिए दोनों की नज़रें मिलीं, उनकी पुतलियों पर इत्मिनान और उत्सुकता की दो मोमबत्तियां मिलकर हज़ार वॉट के बल्ब जितनी रोशनी पैदा कर रही थीं। इसके बाद उनमें से एक ने 'अधिक जानें' का बटन दबा दिया।

क्रमश:
  

Thursday, August 2, 2018

ब्लैक होल का संकुचित द्रव्यमान हैं इमरान!

'ब्लैक होल' अंतरिक्ष में वो जगह होती है, जहां भौतिक विज्ञान का कोई नियम काम नहीं करता। ब्लैक होल का गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र बहुत शक्तिशाली होता है। इसके खिंचाव से कुछ भी नहीं बच सकता। यहां तक कि प्रकाश भी इस काले धब्बे में प्रवेश करने के बाद बाहर नहीं निकल पाता है। 

तो इस लिहाज़ से आप पाकिस्तान को दुनिया का जीता-जागता 'ब्लैक होल' मान सकते हैं। यहां धर्मान्धता अपने चरम पर है और उसके खिंचाव से अफ़गानिस्तान और भारत जैसे पड़ोसी मुल्क भी अछूते नहीं हैं। बताने की ज़रूरत नहीं कि अमेरिका और चीन जैसे महत्वाकांक्षी देश इस 'ब्लैक होल' को हथियार बना कर अपने पक्ष में इस्तेमाल करना चाहते हैं। पाकिस्तानी सेना वह औजार है, जिसकी सहायता से ये विश्व शक्तियां अलग-अलग तरह के विध्वंसकारी प्रयोग करने के लिए पाकिस्तानी अस्मिता की चीर-फाड़ करती रहती हैं।

तो क्या 'इमरान खान' भी ऐसे ही किसी प्रयोग के नए रासायनिक तत्व भर हैं? पाकिस्तान में हुए आम चुनावों के नतीजे स्पष्ट होने के बाद से भारतीय मीडिया में इस सवाल के कई तरह से जवाब दिए जा रहे हैं। लेकिन हर जवाब में नकारात्मकता ही ज़्यादा है। कोई भी पाकिस्तान के संबंध में नई उम्मीद जगाने वाली बात करने का खतरा मोल नहीं लेना चाहता है।

खैर, जैसे 'ब्लैक होल' रहस्यमय होते हैं, वैसे ही पाकिस्तान एक रहस्यमय देश है। मुम्बई अटैक के मास्टरमाइंड 'हाफ़िज़ सईद' की पार्टी को चुनाव में एक भी सीट न मिलना एक ऐसा ही रहस्य है। क्या इसे पाकिस्तान में हो रहे ज़मीनी बदलावों का संकेत माना जाए? इस सवाल का जवाब भविष्य के गर्भ में है।

लेकिन क्या पाकिस्तान की दागदार राजनीतिक विरासत, वहां की सरकारों में सेना का दखल, विदेशी ताक़तों की कठपुतली बने राजनेता, देशव्यापी धर्मान्धता और कट्टरता जैसी तमाम बुराईयों के आधार पर ही इमरान सरकार के भविष्य का आंकलन करना ठीक रहेगा?

इमरान खान शायद पाकिस्तान के पहले ऐसे प्रधानमंत्री होंगे, जिन्होंने काफ़ी लंबा वक्त हिंदुस्तान में गुज़ारा है। एक क्रिकेटर और फिर एक कमेंटेटर की हैसियत से वह लगातार भारत का दौरा करते रहे हैं। ज़ाहिर है वे अपने पूर्ववर्ती वज़ीर-ए-आज़मों की तुलना में भारत की ज़्यादा बेहतर समझ भी रखते होंगे। उन्होंने अपनी पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में पाकिस्तान में फैले भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की इच्छा जताई है। साथ ही इमरान चाहते हैं कि उनको मिलने वाले प्राधनमंत्री आवास का इस्तेमाल जनसरोकार के कार्यों के लिए किया जाए।

कइयों को इमरान की घोषणाएं वास्तविक कम लोकलुभावन ज़्यादा लगी हैं। बेशक इसकी कई वाजिब वजहें भी हैं। पर याद रखिए, वैज्ञानिक 'ब्लैक होल' को ही नए सृजन का शुरुआती बिंदु भी मानते हैं। क्या पता इमरान वही 'संकुचित द्रव्यमान' हों, जहां से बिल्कुल नया पाकिस्तान बनना शुरू होने वाला हो।

Wednesday, August 1, 2018

कीकी! क्या तुम्हें ज़िंदगी से प्यार है?

'सेक्रेड गेम्स' में अपने ढाबे में देसी ठर्रा परोसने वाली 'कांता' नौसिखिया गुड़े 'गायकतोंडे' से कहती है- "तुझे जिंदा रहने का है, तो डेयरिंग कर..." कांता की यही सीख गायकतोंडे के लिए ज़िंदगी का 'ब्रह्म ज्ञान' बन जाती है।
'कीकी चैलेंज' स्वीकार कर रहे लोगों को भी मुगालता है कि वे कुछ 'डेयरिंग' कर रहे हैं। अगर 'कीकी चैलेंज' का नाम आप पहली बार सुन रहे हैं, तो शॉर्टकट में बस इतना समझ लीजिए कि यह 'आइस बकेट चैलेंज' की तरह ही मूर्खतापूर्ण आचरण करने की चुनौती देने वाला नया सोशल ट्रेंड है। इसमें चुनौती स्वीकार करने वाले व्यक्ति को चलती गाड़ी से उतर कर थोड़ी देर डांस करना होता है और फिर दोबारा चलती गाड़ी में बैठना होता है। इस दौरान गाड़ी चलाने वाला दूसरा व्यक्ति नाचने वाले का वीडियो रिकॉर्ड करता है।
'कीकी चैलेंज' की वजह से भारत सहित पूरी दुनिया से दुर्घटनाओं की ख़बरे आने लगी हैं। कीकी चैलेंज के पागलपन से पहले दुनिया 'ब्लू व्हेल' जैसा जानलेवा खेल भी खेल चुकी है। लेकिन, इस तरह के आत्मघाती ट्रेंड का बार-बार वायरल होना साबित करता है कि हम सस्ती लोकप्रियता पाने और नकली रोमांच का अनुभव करने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हैं।
विडम्बना ये है कि ये पागलपन उस दौर में फैल रहा है, जब जनसरोकार से जुड़े मुद्दों के साथ खड़े होने वाले लोगों की संख्या लगातार घटती जा रही है। हम भारतीय लोगों को अगर चैलेंज लेना ही है, तो मॉब लिंचिंग वाली भीड़ के सामने खड़े होने का चैलेंज लेना चाहिए। रेप विक्टिम को न्याय दिलाने का चैलेंज लेना चाहिए। बढ़िया जन प्रतिनिधि चुनने की चुनौती स्वीकार करनी चाहिए। स्वच्छ भारत अभियान और सर्व शिक्षा अभियान में सहयोग देने की चुनौती स्वीकार करनी चाहिए। दहेज प्रथा और बेरोज़गारी के खिलाफ़ मुंह खोलने का माद्दा दिखाना चाहिए। कहने का मतलब है कि सही अर्थों में कुछ 'डेयरिंग' करने के विकल्पों की समाज में कोई कमी नहीं है।
हॉलीवुड की एक सस्पेंस-थ्रिलर मूवी है 'SAW' (लकड़ी काटने वाली आरी)। इस मूवी का मनोरोगी विलेन केवल उन लोगों की हत्याएं करता है, जिन्हें अपने जीवन से प्यार नहीं है। यानी ऐसे लोग जो आत्महत्या की कोशिश कर चुके हैं, नशीली दवाएं लेते हैं या लक्ष्यहीन जीवन जीते हैं। फ़िल्म की कहानी काल्पनिक है और इसमें दिखाए गए तौर-तरीकों को किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता है। लेकिन, यह भी ज़रूरी है कि 'कीकी चैलेंज' सरीखे पागलपन में शामिल होने वाले लोगों को ज़िंदगी से प्यार करना सिखाया जाए। ज़रूरत पड़ने पर उनके साथ सख्ती भी बरती जाए।

Monday, February 8, 2016

सोलो डे (लंबी कहानी, पांचवीं कड़ी)

"भईया, आप मेरी जगह होते, तो क्या करते?"
मेरे यहां आने पर वो भरसक ख्याल रखता था कि सिगरेट के धुंए से मुझे परेशानी ना हो. इस वक्त वह खुली खिड़की के पास कुर्सी लगा कर सिगरेट के साथ चाय सुड़क रहा था. फेफड़े के धुएं को मुंह के रस्ते खिड़की के बाहर उछालने के बाद उसने यह सवाल मेरी तरफ उछाल दिया था.
"पता नहीं..." मुझे हाईपोथैटिकल सवालों से शुरू से कोफ्त होती है, इसलिए मैंने बिना माथा-पच्ची किए कहा.
"विपाश्यना बोले तो आईसोलेशन में जाने के बारे में आपका क्या ख्याल है?" सिगरेट का अंतिम कश लगाने के बाद अब वह बचे हुए टोटे को ठिकाने लगाने की जगह खोज रहा था और इस काम के दौरान भी उसके दिमाग ने मेरे लिए नया सवाल उपजा लिया था. मैं थोड़ी देर तक सोचता रहा.
"काटने पर भी मच्छर को ना मारूं, यह मुझसे नहीं होगा. घर-परिवार से कट के रहना...सोच कर ही जी घबराता है. ना मुझे टाइम से भूख लगती है और ना ही मैं हिसाब रख कर खाता हूं. साधू-सन्यासी बनने का साहस मुझमें तो नहीं." बचे हुए टोटे को उसने चाय के खाली हो चुके प्याले में ही ठिकाने लगा दिया था और फिलहाल मेरा जवाब सुनकर मुस्कुरा रहा था.

अगला दिन रविवार था. वह घंटों तक पुस्तक मेले से मेरी लाई क़िताबों के ढेर के साथ उलझा रहा, शायद कुछ पसंद की किताबें छांट रहा था. फिर उसने घर पर बात की. मेरी हार्ड ड्राइव उठाई और मेरे और टीवी पर चल रहे भारत-ऑस्ट्रेलिया के वन-डे मैच के बीच में आकर खड़ा हो गया.
"15 दिन ज़िंदा रहने के लिए कितने मैगी के पैकेट रखने पड़ेंगे." मेरे जी में आया कि रिमोट उसके सर पर दे मारूं, पर किसी तरह अपने गुस्से पर काबू किया.
"भाई मेरे, मैथ्स और रिजनिंग मेरे बस की होती, तो तुझ जैसों के साथ कलम से कहानियां नहीं बना रहा होता." मैंने खीज कर कहा.
"कोई गल नहीं, मत बताओ. चलो बाय!" इतना कह कर वह दनदनाते हुए दरवाज़े की तरफ चल पड़ा. मैं कुछ पूछ पाता इससे पहले ही दरवाज़े के पास पहुंच कर ठिठका और बिना मेरी तरफ देखे ही बोला-
"15 दिन के लिए आइसोलेशन में जा रहा हूं. मेरी खोज-ख़बर लेने की ज़रूरत नहीं है. मोबाइल तुम्हारे पास ही पड़ा है. तुम्हारी कुछ किताबें और हार्ड ड्राइव लेकर जा रहा हूं. ज़िंदगी और मौत का मामला हो, तभी तंग करना." इसके बाद वह चला गया.

 जब से उसकी नींद की गोली खाने की नई आदत का पता चला था, मैं उसे लेकर काफी सतर्कता बरतने लगा था. इसलिए, दो दिन तक जब वह सच में दिखाई नहीं दिया, तो मुझे उसकी चिंता होने लगी. उस दिन दफ्तर से लौटते वक्त बाइक का हैंडल बरबस ही उसके घर की तरफ जाने वाली सड़क की ओर मुड़ गया. जनाब घर की सीढ़ियों के पास ही मिल गए. कहने लगा कि आइसोलेशन में ही हूं, बस सिगरेट खत्म हो गई थी. मुझे बड़ी हंसी आई.

उस रात मैं उसके कमरे पर पहली बार रुका. उसके हाथों की बनी मैगी भी खाई, पर वह मुझसे ना के बराबर ही बोला. फिर वो अपनी चारपाई पर जाकर पसर गया. वह रह-रह कर करवटें बदलता था. यकीनन वो सोने का नाटक कर रहा था. मेरी आंखों में भी नींद नहीं थी. मैं काफी देर तक उसे यूं तड़पता देखता रहा. वह वाकई अकेला ही तो था. थोड़ी देर बाद मैं इस सोच में खो गया कि अगर मैं वाकई उसकी जगह होता, तो क्या करता?

(क्रमश:)

Saturday, February 6, 2016

स्टोरी डे (लंबी कहानी, चौथी कड़ी)


हमारी दोस्ती 'जय' और 'वीरू' टाइप नहीं थी. क्योंकि ना तो मैं उतना संजीदा था और ना ही वो उतना दिलफेंक. 'कृष्ण' और 'सुदामा' से भी इसकी तुलना जायज नहीं कही जा सकती. सबसे बड़ा फर्क तो यही था कि हम हाड़-मांस से बने साधारण इंसान थे. इसके अलावा हम दोनों मध्यवर्गीय परिवार से ही आते थे और कमाई के मामले में उन्नीस-बीस का ही अंतर था. शायद हमारी दोस्ती 'बिल गेट्स' और 'स्टीव जॉब्स' जैसी थी. मैं उसकी जीवन की त्रासदियों में अपनी कहानी ढूंढ लिया करता और वो दुनिया से अपनी बेबाक रचनाओं के बूते नया पंगा लेने की जुगत में लगा रहता. हम दोनों दुनिया से अपने-अपने ढंग से संवाद करते और जहां मौका मिलता एक-दूसरे को वैचारिक मतभेदों से भेद डालने में कोई कसर नहीं छोड़ते. पर आज जब प्यार में चोट खाकर वह असहाय होकर तड़प रहा था, तो हमारी नजदीकियां आपसी रिश्ते को नया नाम देने की उधेड़बुन में खोई हुई थीं.

उसने हॉस्पिटल में एडमिट होने से इंकार कर दिया था, सो उसे उठा कर अपने यहां ली ले आया था. दवाईयां अब तक ठीक से अपना असर नहीं दिखा पाई थीं. बुखार उतरने का नाम नहीं ले रहा था और कमजोरी की वजह से उसे बार-बार चक्कर भी आने लगे थे. इस बीच मैंने बॉस से कह कर 'वर्क टू होम' ले लिया था और दिन-रात उसी की देखभाल में लगा था.

उस रात मैं उसके माथे पर गीली पट्टियां रख कर बुखार उतारने की कोशिश में लगा था, जब उसने आंख मूंदे हुए ही अपनी कहानी बतानी शुरू की.

"हमारा प्यार शुरू से ही बेमेल था. वो सबकुछ मानने वाली लड़की थी, मैं हर चलन से विरोध जताने वाला लड़का था. उसे दुनिया को इसकी मौजूदा विसंगतियों के साथ स्वीकार करने की कला आती थी, वहीं मैं दुनिया बदलने के ख्वाब अब तक देखता हूं. हमारा अलग होना शायद पहले से तय था. क्योंकि हम दोनों में एक ही समानता थी कि हम अव्वल दर्जे के ज़िद्दी थे."

इतना कहने के बाद वह थोड़ी देर के लिए चुप्प हो गया. उसकी बंद आंखों के कोर से एक-एक करके कई बूंदें निकलने लगीं और पानी की एक लकीर सी बनाती हुई बिस्तर में कहीं गुम होने लगीं. भीगी पट्टी को उसके सिरहाने रख, मैं उसके सीने को अपने हाथों से हौले-हौले सहलाने लगा. कुछ पल बीते होंगे, जब उसके होठों पर एक दर्द भरी मुस्कान उभर आई और उसने हल्की सी आह भर कर दोबारा बोलना शुरू किया-

"प्यार करने वालों के साथ यही सबसे बड़ी दिक्कत है. पहले तो उन्हें अपने साथी का अलग स्वभाव अनूठा लगता है, पर बाद में यही अंतर अलगाव की वजह बनने लगता है. अक्सर जब दो प्यार करने वालों की जिद उनकी मोहब्बत से ज्यादा ताक़त पा जाती है, तो मज़बूत से मज़बूत रिश्ता भी टूट कर बिखर जाता है. हमारे साथ भी यही हुआ."

इसके बाद उसने आगे कुछ भी नहीं कहा. धीरे-धीरे उसकी सांसे आश्चर्यजनक रूप से सामान्य होने लगीं, बदन पसीना छोड़ने लगा और उसकी आंखें शिथिल पड़ती चली गईं. शायद उसने अब तक एक अनकही कहानी का बोझ अपने सीने पर लाद रखा था, जो बुखार की शक्ल में अब उतर चुका था.

(क्रमश:)

Thursday, February 4, 2016

स्लैप डे (लंबी कहानी, तीसरी कड़ी)

सुबह से दो बार उसकी मां का फोन आ चुका था. दफ्तर गया तो पता चला कि वो आज भी काम पर नहीं आया है. तरह-तरह के बुरे ख्याल मन में आने लगे. ग़लती मेरी ही थी, मुझे उसका मोबाइल फोन यूं अपने पास नहीं रखना चाहिए था. अब उसकी मां को क्या जवाब दूं? पर आखिर वो गया कहां? वैसे तो शाम से लेकर देर रात तक रोज कभी भी आकर मेरे घर का डोर बेल बजा ही देता था. कहीं ज़हर तो नहीं खा लिया? चूहा मारने की दवा तो उसके डेरे के बाजू वाले राजू किराना स्टोर में मिलती ही होगी? वहां नहीं तो मोर या रिलायंस फ्रेश से "हिट" तो खरीद ही सकता है. नहीं, वो इतना कमजोर नहीं. ज़रूर बाइक पंक्चर हो गई होगी. या ठंड की वजह से बाइक की बैट्री डाउन हो गई होगी और सेल्फ स्टार्ट काम नहीं कर रहा होगा. ढंग से किक मारना भी तो उसे नहीं आता. पर अब तक तो उसे फिर भी ऑफिस आ जाना चाहिए था. साढ़े बारह होने को हैं. ओला, उबर, ऑटो इतने तो ऑप्शन हैं. वैसे तो टाइम पर ही आता था, लेकिन जो हुआ उसके बाद उसे किसी भी तरह की पाबंदी की परवाह नहीं रह गई है. उसकी लेटलतीफी की बढ़ती आदत से बॉस से लेकर उसके कलिग तक नाराज़ होने लगे हैं. वो तो कहिए कि उसके काम का पिछला रिकॉर्ड इतना अच्छा है कि सब अब तक बर्दाश्त कर रहे हैं.
लंच की बेल बजी, तो मैं अपना टिफिन कैरियर लेकर कैंटीन की तरफ चल पड़ा. मन ठीक ना हो, तो अंडा करी भी आलू के बासी चोखे जैसी लगती है. जैसे-तैसे खाना निपटाया. पर दिमाग उसी के बारे में सोचता रहा. उसके रूम में तो पंखा भी नहीं है. लटक के को मर नहीं सकता. पट्ठे ने 'एसी' लगा रखा है, फिर भी मेरे घर पर आकर सोता है. खाना भी बाहर ही खाता है, इसलिए छूरी भी शायद उसके रूम पर ना ही हो. दाढ़ी भी इलैक्ट्रिक ट्रीमर से बनाता है, तो ब्लेड भी नहीं रखता होगा. मतलब, गले या कलाई की नस काट लेने के चांसेज़ भी ना के बराबर ही हैं. लेकिन, नस तो खिड़की का कांच तोड़ कर उससे भी काटी जा सकती है. मैं सिहर उठा. खुद पर बहुत गुस्सा आया, पर फिर भी उसके बारे में अंट-शंट ही सोचता रहा. मैंने ऑफिस के व्हाट्सअप ग्रुप पर एक मैसेज छोड़ा और चुपचाप उसके 'रूम' के लिए निकल पड़ा.

तीन मंजिला इमारत के टॉप फ्लोर पर छत के एक हिस्से पर बना छोटा सा कमरा था. दरवाज़े के पास पहुंच कर मैंने उसका नाम लेकर आवाज़ लगाई. पिछली बार आया था, तो उसकी गर्लफ्रेंड से यहीं पहली और आख़िरी बार मिला था. इसलिए, बेधड़क दरवाज़ा खटकाने की हिम्मत नहीं हुई. दरवाजे पर हाथ रखा तो वह भीतर की तरफ खुलता चला गया.

वह वहीं था. पटरे वाली छोटी सी चारपाई पर रजाई ओढ़े किसी लाश की तरह पड़ा हुआ था. वह शायद कराह रहा था या फिर उसके सीने का बलगम बज रहा था. मैंने हल्के से आवाज़ दी, पर उसके जिस्म में किसी भी तरह की हरकत नहीं हुई. मेरा जी एक बारगी जोर से घबराया. कहीं ये मरने वाला तो नहीं. पता चला कि मैं ही पुलिस-वुलिस के चक्कर में फंस जाऊं. मन हुआ की लौट चलूं. पर ये संस्कार साले ऐसे समय पे ही पांव पकड़ लेते हैं. धीरे से रजाई हटाई. उसकी सांसे चल रही थीं. सिर पर हाथ धरा, तो तेज तपिश महसूस हुई. शायद बेहोश था. नहीं, उसने नींद की गोलियां ली थीं. गोलियों की एक पूरी पत्ती उसके सिरहाने रखी थी. मैं पास रखे मयूर जग से पानी भर लाया. उसके चेहरे पर छिड़का, तो उसने धीरे-धीरे आंखें खोल दीं. मैंने गिलास को उसके होठों से सटा दिया. उसे होश आ गया था, पर मुझसे आंखें चुरा रहा था. मैं उसके बगल में चारपाई पर ही बैठ गया. मेरी भी समझ में नहीं आ रहा था कि उससे क्या कहूं. लेकिन चुप्पी मुझे काट खाए जा रही थी.

"बुखार में नींद की गोली खाता है कोई भला?" मैंने हल्की नाराज़गी से कहा. उसने गर्दन घुमा ली और बंद खिड़की को घूरने लगा.
"डॉक्टर के पास चलें?" पता नहीं क्यों इस सवाल पर उसने अपनी आंखें जोर से भींच लीं. मुझे बड़ी खीज हुई. मैंने इस बार तेज आवाज़ में पूछा-
"क्या चाहते हो?" उसने किसी रोबोट की तरह एक झटके में अपनी गर्दन घुमाई और मेरी तरफ देख कर चीख पड़ा-
"मर जाने दो मुझे, प्लीज़"
"तड़ाक"
मैंने उस दिन उस पर हाथ क्यों उठाया, मैं आज तक समझ नहीं पाया. बस इतना जानता हूं कि उसके गालों पर मैंने अपना गुस्सा नहीं निकाला था. वर्ना भला हम अगले ही पल गले लग कर क्यों रोए होते?

(कहानी अभी बाकी है)

Tuesday, February 2, 2016

सिनेमा डे (लंबी कहानी, दूसरी कड़ी)


"तमाशा" देखते-देखते वह हिचकियां ले-ले कर रोने लगा था. फिल्म बीच में ही छोड़नी पड़ी. अकेले बैठ के आंसू बहाना अलग बात है, पर यूं सरेआम!!! मैंने उससे साफ-साफ कह दिया-
"कुछ दिन के लिए थिएटर में मूवी देखना छोड़ दो."
किसी भी तरह की प्रतिक्रिया देने के बजाए, वह मूक बधिर बन गर्म पराठे पर धीरे-धीरे पिघलते मक्खन के टुकड़े को ही घूरता रहा.
"एक बार मोबाइल दो ना, क्या पता उसकी कॉल आई हो या फिर कोई मैसेज आया हो." पराठा खाते-खाते अचानक उसे अपने मोबाइल की याद हो आई थी. मैं कसमसा कर रह गया. 'आम' के विमर्श में 'इमली' को घसीट लाना उसका नया शगल बनता जा रहा था. पर गुस्सा होने के बजाए, ना जाने क्यों मुझे उस पर बहुत तरस आया.
"मोबाइल को तो तू भूल जा. ऐसा कुछ होगा तो मैं बता दूंगा."
मैंने उसका मोबाइल छीन लिया था. मजबूरी थी. बार-बार मोबाइल चेक करता रहता था. वजह पूछने पर कहता कि उसे कॉल आने का भ्रम होने लगा है. नींद में भी रिंगटोन सुनाई देने लगी है.
इसके बाद हम साथ में कोई मूवी देखने नहीं गए. पर इस वाक्ये का एक दूसरा असर भी हुआ. अब वह अक्सर मेरे यहां आने लगा. मुझसे बोलने बतियाने नहीं, मेरे डेस्कटॉप का मूवी फोल्डर एक्सप्लोर करने. मैंने भी सोचा कि चलो ठीक ही है, मन बहले ना बहले कम से कम सरेआम रोकर अपनी फजीहत तो नहीं करवाएगा.
"भईया, कल श्मशान चलोगे?" आधी रात को पानी पीने के लिए किचन की तरफ जा ही रहा था कि उसकी आवाज मेरे कानों से टकराई. पलट कर देखा, तो उसका चेहरा रजाई के अंदर ही था. मुझे लगा सपने में बड़बड़ा रहा है. पर पानी पीकर वापस लौट ही रहा था कि उसने दोबारा पूछ लिया.
"क्या बात हो गई." मैंने उसके करीब आकर आशंकित स्वर में सवाल किया.
"कुछ नहीं, बस आज 'मसान' देखी तो श्मशान जाने का जी किया." उसका चेहरा अब भी रजाई के अंदर ही था. मेरा सर बुरी तरह भन्ना गया. संस्कारों ने पांव पकड़ लिए, वर्ना एक लात तो उसे पड़ ही जाती.
अगले दिन हम हिंडन किनारे वाले श्मशान गए. कोई तीन लाशों को जलता हुआ देखा. वह खुश नज़र आ रहा था. वजह ना मैंने पूछी ना मुझे समझ आई.
अगली रात उसने वही किस्सा दोहरा दिया. बस इस बार उसकी चाहत जुदा थी.
"भईया, चमगादड़ भी तो ठंड में दांत किटकिटाते होंगे ना?"
पानी से भरा ग्लास पूरा गटकने के बाद मैंने बेपरवाही से कहा- "मुझे नहीं पता."
अगले ही पल वह रजाई फेंक कर यू खड़ा हो गया, जैसे शरीर में स्प्रिंग फिट हो.
"चलो ना देख के आते हैं." उसने मनुहार की.
उस रात हम सचमुच अपार्टमेंट के पास वाले नाले तक गए. कीकर और बबूल के झाड़ के पास मंडराने वाले चमगादड़ों की आवाज़ सुनने की नाकाम कोशिश की.
उसने खुशी से कूदते हुए घोषणा की "चमगादड़ ठंड में दांत नहीं किटकिटाते हैं." बाद में पता चला कि ये 'आंखों देखी' फिल्म का असर था.
फिर तो उसकी उट-पटांग हरकतों को जैसे पर लग गए. कभी 'शिप ऑफ थीसियस' देखने के बाद आंखें बंद करके कैमरे से तस्वीरें खींचने लगता, तो कभी 'मोटरसाइकिल डायरीज़' देखने के बाद अपनी बाइक के साथ कई दिनों तक गायब हो जाता.
एक दिन आते ही उसने कहा-
'थैंक्स भईया!'
अचानक उसके मुंह से थैंक्स सुनकर मेरा उत्सुक होना लाज़मी था. पर इस बार मैंने उसका खेल उसके साथ ही खेल दिया. गंभीरता ओढ़कर चुप्पी साधे रखी और हाथ में थमे अख़बार में आंखें यूं गड़ाए रखीं, जैसे दुनिया खत्म होने का समाचार पढ़ रहा होउं.
"थैंक्स भईया, बिना हैप्पी एंडिंग वाली फिल्मों से इंट्रोडक्शन करवाने के लिए." अपनी कृतज्ञता जता कर वह चला गया, शायद कोई दूसरी फिल्म देखने.
(कहानी अभी बाकी है.)